108 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
को इसमें दखल देने की शक्ति नहीं देनी चाहिए क्योंकि इसमें कानून का मामला उतना अधिक अन्तर्ग्रस्त नहीं है, जितना कि इसमें अन्तर्निहित अधिकारिता का मामला अन्तर्ग्रस्त है। यदि उच्च न्यायालय किसी वकील की सुगमता को देखते हुए यह प्रमाणित कर देता है कि इस तथ्य के बावजूद कि किसी मुकदमे में अन्तर्ग्रस्त मामला इस तथ्य के कारण भाग (क) और (ख) की श्रेणी में नहीं आता कि संपत्ति का मूल्य निर्धारित मूल्य से कम है, तो भी यह ऐसा कारण या मामला है जिसे इस तथ्य के मद्देनजर उच्चतम न्यायालय के पास भेजा जाना चाहिए कि यह केवल मुकदमा लड़ने वाले व्यक्ति विशेष को ही प्रभावित नहीं करता है, बल्कि यह मामला आम जन को प्रभावित करने वाला है। मेरा तो यह मानना है कि यह अधिकारिता उच्च न्यायालय में ही अन्तर्निहित होनी चाहिए और इसलिए मेरे विचार से खण्ड (ग) को संसद की शक्ति के दायरे के अधीन नहीं रखा जाना चाहिए।
दूसरी तरफ, यदि मेरे मित्र प्रो. सक्सेना द्वारा प्रस्तुत संशोधन पारित हो जाता है, तो दो बातें होंगी। एक तो वह होगी जिसका जिक्र मेरे मित्र बख्शी टेक चन्द पहले ही कर चुके हैं कि संसद दीवानी मामलों में उच्चतम न्यायालय के अपीली अधिकार को पूरी तरह हड़प लेगी। मुझे यह बड़ा ही विनाशकारी परिणाम लगता है। इस देश में उच्चतम न्यायालय की स्थापना करना और उससे अपील की सारी शक्ति पूरी तरह से वापस लेने तथा उसे निरावृत्त करने का प्राधिकार संसद को प्रदान करना एक बड़ी ही मिथ्या बात होगी। हम लोग अपने ही हाथों में इसे शक्ति को रखने का साहस संजो सकते हैं तथा यह कह सकते हैं कि दीवानी मामलों में उच्चतम न्यायालय अपीली न्यायालय के रूप में कार्य नहीं करेगा और उसकी स्थिति उसी तरह से सीमित कर दी जाएगी जैसा कि फेडरल कोर्ट के मामले में किया गया था।
दूसरी बात यह होगी कि संसद उप-खण्ड (ग) को समाप्त करने की स्थिति में आ जाएगी जबकि मैं कह चुका हूँ कि इसे स्थायी तौर पर बनाये रखा जाना चाहिए क्योंकि यह वस्तुतः अन्तनिर्हित अधिकारिता का मामला है। इसलिए, मुझे लगता है कि मेरा संशोधन संख्या 25 इस तर्क को पूरा करता है कि उच्चतम न्यायालय की अपीली शक्ति को लचीला बनाया जाना चाहिए क्योंकि मेरे संशोधन के अधीन संसद के लिए
खुला विकल्प रहेगा कि वह उच्चतम न्यायालय के अपीली अधिकारिता को पूरी तरह से खत्म किये बिना या खण्ड (ग) में अन्तर्विष्ट उपबंधों को विनियमित करे। महोदय, इसलिए मैं श्री सक्सेना के संशोधन का विरोध करता हूँ।
(कुल मिलाकर 4 संशोधन स्वीकृत हुए, एक संशोधन अस्वीकृत हुआ। अनुच्छेद 111, यथासंशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया।)
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