110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
1932 बिल्कुल वहीं है जो संशोधन संख्या 1928 है। वस्तुतः यदि संशोधन संख्या 1928 प्रस्तुत हो चुका है, तो संशोधन संख्या 1932 को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
माननीय सभापतिः मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैंने इसे एक नये अनुच्छेद के रूप में लिया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः प्रारूप संविधान में इसके निर्णयों की समीक्षा करने का उपबंध नहीं है। यह महसूस किया गया कि वह एक बड़ी कमी थी और इस नये अनुच्छेद के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में वह शक्ति प्रदान करने का प्रस्ताव किया गया है।
माननीय श्री के. संथानम (मद्रासः जनरल)ः महोदय, यदि मैं गलत नहीं हूँ कि इसका प्रारूप उतना अच्छा नहीं है जितना होना चाहिए। इस बात के लिए, मेरा सोचना यह है कि उच्चतम न्यायालय को शक्ति प्रदान करने के लिए संविधान में अनुच्छेद शामिल करना तथा फिर यह कहना कि उस शक्ति को उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के द्वारा सीमित किया जाएगा, सही नहीं है। मेरे विचार से यह एक खराब कानून है। समीक्षा करने की साधारण शक्ति के आधार पर भी संसद को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
माननीय सभापतिः यह इसके अपने निर्णय के संदर्भ में ही है।
माननीय श्री के. संथानमः मैं उस विषय पर आ रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि उच्चतम न्यायालय को अपने ही निर्णय की समीक्षा करने के लिए स्वतंत्र छोड़ किये जाने के पीछे एक बड़ा कारण है। इन दो बातों के संबंध में, यह चीज कुछ दोषपूर्ण है। मैं डॉ. अम्बेडकर को यह सुझाव दूँगा कि वह यह देखें कि इसे इसी रूप में जाना चाहिए या फिर क्या इसके रूप पर पुनर्विचार नहीं किया जाना चाहिए?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं समझता हूँ कि श्री संथानम ने जो समुक्ति की है, वह पूरी तरह से गलत है। सर्वप्रथम, हम उच्चतम न्यायालय को कोई नियम बनाने की शक्ति नहीं दे रहे हैं। वह शक्ति अनुच्छेद 21 के द्वारा प्रत्यायोजित की जा रही है। यदि वह, उस अनुच्छेद को देखें, तो उसमें लिखा हैः
फ्संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय समय-समय पर, राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के साधारणतया, विनियमन के लिए नियम बना सकेगा जिसके अंतर्गत निम्नलिखित भी हैः’’
इसलिए यह कहना सही नहीं है कि हम उच्चतम न्यायालय को शक्ति प्रदान कर रहे हैं। यह शक्ति उच्चतम न्यायालय के पास पहले से है और उसे उसका प्रयोग राष्ट्रपति के अनुमोदन से करना है। दूसरी बात जिससे श्री संथानम भ्रमित हुए हैं, वह यह है कि