अनुच्छेद 121 - Page 131

112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अनुच्छेद 121

** माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँः

‘‘कि अनुच्छेद 121 के खण्ड (3) के स्थान पर निम्नलिखित अन्तःस्थापित किया जाएः

(3) उच्चतम न्यायालय प्रत्येक निर्णय खुले न्यायालय में ही सुनाएगा, अन्यथा नहीं और अनुच्छेद 119 के अधीन प्रत्येक प्रतिवेदन खुले न्यायालय में सुनाई गई राय के अनुसार ही दिया जाएगा, अन्यथा नहीं।

महोदय, मैं संशोधन संख्या 1966 भी प्रस्तुत करता हूँ।

‘‘कि अनुच्छेद 121 के खण्ड (4) के लिए, निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएः

(4) उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रत्येक निर्णय और ऐसी प्रत्येक राय, मामले की सुनवाई में उपस्थित न्यायाधीशों के बहुमत की सहमति से ही दी जाएगी, अन्यथा नहीं, किंतु इस खंड की कोई बात किसी ऐसे न्यायाधीश को, जो बहुमत से सहमत नहीं है, अपना विसम्मत निर्णय या राय देने से बाधित नहीं करेगी।

* * * * *

ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभापति महोदय, मुझे खेद है कि मैं अपने माननीय मित्र श्री लारी द्वारा प्रस्तुत संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता।

मुझे लगता है कि उनके संशोधन में जो बात उठायी गई है, उसे उन्होंने पूरी तरह गलत समझा है।

उच्चतम न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति को राष्ट्रपति के अनुमोदन के विषयाधीन बनाया जाना आवश्यक है क्योंकि यदि उन नियमों को उच्चतम न्यायालय पर ही पूरी तरह से छोड़ दिया जाये, तो देश के राजस्व पर काफी बोझ पड़ेगा। उदाहरण के लिए, मान लें कि कोई नियम बनाया जाता है कि कतिपय मामलों की सुनवाई दो न्यायाधीशों द्वारा की जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाया गया वह एक सरल कानून हो सकता है। लेकिन निःसंदेह, इससे जनता के राजस्व पर बोझ पड़ेगा। उदाहरण के लिए शुल्कों के विनियमन के संबंध में नियमों में वैसा ही उपबंध है। यह फिर जनता के राजस्व का मामला हो जाता है। इसे उच्चतम न्यायालय पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसलिए, मेरा यह कहना है कि अनुच्छेद 121 में अन्तर्विष्ट ये उपबंध कि नियम राष्ट्रपति के अनुमोदन के विषयाधीन होने चाहिए, एक समुचित प्रक्रिया है, जिसका पालन किया जाना चाहिए। चूंकि इस प्रकार के मामले जिनसे जनता के राजस्व पर बोझ पड़ता और जिस बोझ का वित्तपोषण विधायिका तथा कार्यपालिका

** वही, पृष्ठ 645

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 6 जून, 1949, पृ. 649-50