अनुच्छेद 193-क - Page 138

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उसी प्रकार से जहाँ तक पेंशन का संबंध है, अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की पेंशन उसके वेतन के बराबर ही होती हैः दोनों के बीच कोई अन्तर नहीं होता। इंग्लैड में भी जहां तक मुझे जानकारी है, पेंशन की राशि न्यायाधीश के वेतन के सत्तर या अस्सी प्रतिशत के बराबर होती है। सेवानिवृत्ति संबंधी हमारे नियम जैसा कि मैं कह चुका हूँ, व्यक्ति पर एक प्रकार का बोझ डाल देता है क्योंकि उसे साठ वर्ष की आयु में सेवा से निवृत्त होना पड़ता है। फिर हमारे पेंशन संबंधी नियम इतने कड़े हैं कि हम व्यावहारिक रूप से बहुत कम पेंशन प्रदान करते हैं। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मैं समझता हूँ कि प्रो. के.टी. शाह द्वारा प्रस्तावित दोनों ही संशोधन उस प्रयोजनार्थ जो उनके मन में है कि कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग रखना तथा उस दृष्टि से भी कि इससे न्यायपालिका में पदधारण करने वाले व्यक्तियों पर बहुत अधिक बोझ पड़ जायेगा, अनावश्यक है।

श्री एच.वी. कामतः मैं यह बताना चाहता हूँ कि यह संशोधन सेवानिवृत्ति न्यायाधीशों पर लागू नहीं होकर सेवारत न्यायाधीशों पर लागू होते हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं समझता हूँ कि यह संशोधन काफी गफलत पैदा करने वाला लगता है। इसमें यह कहा गया है कि यह उस व्यक्ति के मामले में लागू होगा जो लगातार पाँच वर्षों की अवधि तक सेवा कर चुका हो। उसका अर्थ यह है यदि राष्ट्रपति किसी न्यायाधीश को पाँच वर्षों से कम अवधि के लिए नियुक्त करें, तो वह इसके विषयाधीन नहीं होगा, इससे तो प्रो. के.टी. शाह जिस उद्देश्य को पूरा करना चाहते हैं, वही विफल हो जायेगा। किसी भी मामले विशेष में राष्ट्रपति इस बात के लिए स्वतंत्र होगा कि वह किसी न्यायाधीश को पाँच वर्षों से कम की अवधि के लिए नियुक्त करे और बाद में उसे राजदूत या वाणिज्य राजदूत या व्यापार आयुक्त आदि के पद पर नियुक्त करे। मुझे तो यह पूरा मामला ही बिल्कुल गलतफहमी से भरा लगता है।

माननीय सभापतिः प्रश्न है कि निम्नलिखत नया अनुच्छेद 193-क को अनुच्छेद 193 के बाद जोड़ा जाएः

193-क ‘‘कोई व्यक्ति जो लगातार 5 वर्षों तक उच्चतम न्यायालय या फेडरल न्यायालय या उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो, को भारत सरकार या संघ में शामिल किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी कार्यपालक के पद पर जिसमें राजदूत, मंत्री, पूर्णाधिकारी, उच्चायुक्त, व्यापार आयुक्त, वाणिज्य राजदूत शामिल हैं, के साथ-साथ भारत सरकार या संघ में शामिल किसी राज्य की सरकार के अधीन मंत्री पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकेगा।’’

[ (प्रो.के.टी. शाह का यह संशोधन अस्वीकृत हुआ।) ]