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ऐसे मामलों के संबंध में समय पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के कार्यों का निर्वहन करने हेतु किसी अस्थायी न्यायाधीश की नियुक्ति करना व्यावहारिक नहीं हो सकता और इसलिए एकमात्र दूसरा उपबंध जो अनुच्छेद 196 (जिसके अन्तर्गत यह उपबंध किया गया है कि सेवानिवृत्ति के पश्चात् कोई न्यायाधीश वकालत नहीं करेगा) के समकक्ष हो सकता है वह उपबंध अनुच्छेद 200 में अन्तर्विष्ट है। जैसा कि मेरे मित्र डॉ. टेकचन्द ने कहा है कि अनुच्छेद के प्रयोजन या मंशा के संबंध में बहुत सारी गलतफहमी या भ्रम की स्थिति बनी हुई है। उच्च न्यायालयों से सेवानिवृत्त हुए न्यायाधीशों को पिछले दरवाजे के माध्यम से सेवा में विस्तार दिए जाने की कोई मंशा इस अनुच्छेद में अन्तर्निहित नहीं है। इसलिए, इस संबंध में किसी को कोई भ्रम रखने की जरूरत नहीं है।
मुझसे दूसरा प्रश्न परन्तुक के बारे में पूछा गया है। बहुत सारे लोगों जिन्होंने परन्तुक पर बोला है, ने कहा है कि उन लोगों को यह परन्तुक उद्देश्यविहीन और निरर्थक लगता है। मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूँ। मेरे विचार से यह परन्तुक परमावश्यक है। यदि परन्तुक नहीं होगा तो संबंधित प्राधिकारियों के लिए किसी न्यायाधीश पर जुर्माना लगाने का खुला विकल्प बना रहेगा। यदि वह आमंत्रण को स्वीकार करने से मना कर देता है। यह भी हो सकता है कि आमंत्रण अस्वीकार करने वाले व्यक्ति को अदालत की अवमानना का दोषी ठहरा दिया जाये। हम यह नहीं चाहते कि उच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश जो बीमार रहने, अक्षम होने अथवा अपने किसी निजी कार्य में व्यस्त रहने के कारण मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिए गए आमंत्रण को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हों, के विरुद्ध इस प्रकार का कोई जुर्माना लगाया जाए। इस परन्तुक का यही औचित्य है। दूसरा प्रश्न यह पूछा गया कि क्या अनुच्छेद 200 में उल्लिखित विशेषाधिकार सेवानिवृत्त न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को मिलने वाले वेतन मांगने का हकदार बनायेगा। मेरा उत्तर यह है कि यह मामला पेंशन संबंधी नियमों से शासित होगा। विद्यमान नियम यही है कि जब किसी सेवानिवृत्त व्यक्ति को सरकार के अधीन कोई विशेष कार्य स्वीकार करने के लिए आमंत्रण भेजा जाता है तो उसे पद के वेतन में से उसकी पेंशन को घटाकर जो राशि बनती है, वह भुगतान की जाती है। मैं समझता हूँ कि यह एक सामान्य नियम है। मैं गलत भी हो सकता हूँ। खैर, यह मामला पेंशन नियम से शासित होता है। उसी प्रकार से इस मामले को पेंशन संबंधी नियमों से शासित होने के लिए छोड़ दिया जाये और हमें इस बारे में अनुच्छेद में विशेष तौर पर कुछ भी उल्लेख करने की जरूरत नहीं है। बहस के दौरान इस मुद्दे पर जो भी आलोचना की गई है, उसके संबंध में मुझे तो यही कहना है।
श्री एच.वी. कामतः क्या संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में ऐसा कोई उपबंध है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे पास उसकी प्रति उपलब्ध नहीं है। अमेरिका में इस बारे में प्रश्न नहीं उठता है क्योंकि वहां वेतन और पेंशन लगभग समान है।