124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मैं श्री कपूर के संशोधन संख्या 89 को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ, क्योंकि कुछ लोगों का यह मानना है कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा सेवा से निवृत्त हो चुके अपने मित्र न्यायाधीशों के एक से अधिक बार यह स्वीकार करने का आमंत्रण देकर अनुच्छेद 200 का दुरुपयोग किए जाने की संभावना हो सकती है। मैं, इसलिए श्री कपूर के इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ कि राष्ट्रपति से सहमति लेने के बाद ही आमंत्रण भेजे जाने चाहिएं।
श्री जसपतराय कपूरः क्या मैं यह जान सकता हूँ कि ‘विशेषाधिकार’ शब्द की व्याख्या करने का कार्य संसद पर छोड़ दिए जाने की मंशा है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इसे परिभाषित किया जा सकता है। इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि संसद को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों दोनों को ही शासित करने वाले न्यायपालिका अधिनियम पारित करने पड़ेंगे तथा उसके अन्दर विशेषाधिकार शब्द का निर्धारण और परिभाषा तय की जा सकती है।
श्री जसपतराय कपूरः लेकिन कार्य पर वापस बुलाये गये न्यायाधीशों तथा स्थायी न्यायाधीशों के विशेषाधिकार समान ही रहेंगे। अनुच्छेद 200 में तो यही कहा गया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जी हाँ, लेकिन विशेषाधिकार का अर्थ पूरा वेतन नहीं है।
माननीय सभापतिः श्री जसपतराय कपूर द्वारा प्रस्तुत संशोधन संख्या 89 को डॉ. अम्बेडकर स्वीकार कर चुके हैं। मैं अब इस पर मत लूँगा।
‘‘कि अनुच्छेद 200 में ‘किसी समय’ शब्दों के बाद ‘राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से’ शब्द अन्तःस्थापित किए जाएँ।
संशोधन स्वीकृत हुआ।
[ (डॉ. अम्बेडकर का मूल संशोधन भी स्वीकृत हुआ और अनुच्छेद 200 यथासंशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया।) ]
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अनुच्छेद 202
ऽडॉ. बख्शी टेक चन्दः मुझे आशा है कि मेरे द्वारा प्रस्तुत संशोधन को डॉ. अम्बेडकर स्वीकार करेंगे और अनुच्छेद यथासंशोधित रूप में सभा द्वारा पारित किया जायेगा।
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 7 जून, 1949, पृ. 697