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(ख)उक्त विधि के प्रश्न का अवधारण कर सकेगा और उस मामले को ऐसे प्रश्न परनिर्णय की प्रतिलिपि सहित उस न्यायालय को, जिससे मामला इस प्रकार मंगवा लिया गया है, लौटा सकेगा और उक्त न्यायालय उसके प्राप्त होने पर उस मामले को ऐसे निर्णय के अनुरूप निपटाने के लिए आगे कार्यवाही करेगा।
यह संशोधन है। महोदय, यदि आप चाहें तो इसके बारे में मैं अभी कुछ बोलूँ। लेकिन मैं अंत में अपनी टिप्पणी देना चाहूँगा ताकि दो बार बोलने में जो समय लगे, उसे बचाया जा सके।
माननीय सभापतिः जैसा आप उचित समझें।
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ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं नहीं समझता कि मैंने जो संशोधन प्रस्तुत किया है उस पर कोई निर्णय लेने के लिए काफी लंबी चर्चा की कोई जरूरत है। सभा को स्मरण होगा कि कल जब हम लोग अनुच्छेद 204 के बारे में चर्चा कर रहे थे उस समय मेरे मित्र श्री भारती ने एक प्रश्न उठाया था जोकि अनुच्छेद 204 के अंतिम वाक्य अर्थात् कि उच्च न्यायालय स्वयं को मुकदमा मंगएगा और उसका निपटारा करेगा, से संबंधित था। श्री भारती ने जो प्रश्न उठाया वह मेरे विचार से काफी तर्कसंगत था, वह इस प्रकार था। उच्च न्यायालय को पूरे मुकदमें की सुनवाई करने की जरूरत क्यों होनी चाहिए जबकि अनुच्छेद 204 के मुख्य भाग में सिर्फ यही आवश्यकता दर्शाई गई है कि उसे संविधान की व्याख्या की दृष्टि से कानून की विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्न का ही निपटारा करना चाहिए। उनका यह कहना था कि किसी भी वाद में बहुत सारे प्रश्न अंर्तग्रस्त हो सकते हैं। उनमें से एक प्रश्न इस संविधान की व्याख्या के दृष्टिगत कानून की विषय-वस्तु से संबंधित प्रश्न हो सकता है। दूसरा प्रश्न संसद द्वारा बनाये गये साधारण कानून की व्याख्या से संबंधित प्रश्न हो सकता है। यदि इस प्रकार का कोई मुकदमा हो जिसका मिला-जुला स्वरूप हो, जिसमें संविधान की व्याख्या से संबंधित मुद्दे के साथ-साथ साधारण कानून की व्याख्या से संबंधित अन्य मुद्दे अंतर्ग्रस्त हो सकते हैं जबकि कानून की व्याख्या से संबंधित प्रश्न पर निर्णय लेने तथा फैसला सुनाने की शक्ति न्यायालय को दिया जाना सही हो सकता है लेकिन फिर उच्च न्यायालय को पूरे मामले की सुनवाई करने तथा केवल संविधान की व्याख्या से संबंधित मुद्दे पर ही नहीं बल्कि साधारण कानून की व्याख्या से संबंधित दूसरे मुद्दे पर ही फैसला करने की जरूरत क्यों होनी चाहिए? जैसा कि मैं बता चुका हूँ कि वह एक बड़ा ही महत्वपूर्ण प्रश्न था और जब मैंने उनका तर्क सुना तो मैंने इसकी शक्ति को महसूस किया और इसीलिए
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 8 जून, 1949, पृ. 716-19