128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मैंने इस अनुच्छेद को स्थगित रखने की आपसे अनुमति मांगी।
यदि मैं कहूँ कि जब हम अनुच्छेद 121 पर चर्चा कर रहे थे तब मेरे मित्र श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर ने ऐसा ही प्रश्न किया था जोकि उन मामलों से संबंधित था जिन पर उच्चतम न्यायालय में अपील की जाती है और उनका भी मिला-जुला स्वरूप था अर्थात् उनमें वह मामले भी हैं जिनमें संवैधानिक कानून से संबंधित प्रश्न अंतर्ग्रस्त होते हैं और साथ ही संसद द्वारा बनाए गए साधारण कानून व्याख्या से संबंधित प्रश्न भी अंतर्ग्रस्त होते हैं। मूल-प्रारूप के अनुसार इसमें यह उपबंध किया गया था कि उन सभी मामलों में जिनमें संवैधानिक कानून की व्याख्या से संबंधित कोई मुद्दा शामिल हो, तो उसमें की गई अपील पर निर्णय पाँच न्यायाधीशों की पीठ द्वारा किया जाना चाहिए। श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर ने यह प्रश्न उठाया था कि कोई पक्ष केवल बदमाशी की दृष्टि से पांच न्यायाधीशों की पीठ का लाभ लेने के उद्देश्य से अपनी अपील में संवैधानिक कानून की व्याख्या से संबंधित प्रश्न का सहारा ले सकता है जोकि अंततः गलत पाया जाएगा क्योंकि उसमें कोई सार नहीं होगा। उच्चतम न्यायालय के पाँच न्यायधीश किसी अपील जिसमें वस्तुतः संवैधानिक कानून की व्याख्या का कोई प्रश्न अंतर्ग्रस्त नहीं है, का निपटारा करने में अपना समय क्यों बरबाद करे। सभा को स्मरण होगा कि उनके तर्क को स्वीकार किया गया था और तद्नुसार उपबंध किया गया था। यदि सभा के पास चौथे सप्ताह के संशोधन की सूची संख्या 1, संशोधन 43 से संबंधित पत्र हो तो उसमें यह देखा जा सकता है कि हमने उस समय एक परंतुक लगाया था जिसमें यह कहा गया है कि इस प्रकार के मामले में जहाँ कोई अपील उच्च न्यायालय में आती है जिसमें कानून की व्याख्या से संबंधित प्रश्न अंतर्ग्रस्त न होकर अन्य प्रश्न अंतर्ग्रस्त हों, तो ऐसी अपील उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन गठित साधारण पीठ के पास भेजी जानी चाहिए। मैं नहीं जानता कि इसमें दो न्यायाधीशों या तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा अपील सुनने के बाद यदि वह विशेष पीठ यह प्रमाणित करती है कि इसमें तथ्यात्मक दृष्टि से संविधान की व्याख्या से संबंधित मूल प्रश्न अंतर्विष्ट हैं तभी और केवल तभी अपील पाँच न्यायाधीशों की पीठ को सौंपी जा सकती है। फिर भी पाँच न्यायाधीशों की वह पीठ जिसे इस प्रकार की कोई अपील सौंपी जाएगी केवल संवैधानिक मुद्दों पर निर्णय देगी और किसी अन्य मुद्दमों पर नहीं। संवैधानिक मुद्दों पर निर्णय लेने के बाद न्यायाधीश वह निर्देश देंगे कि उस मुकदमे को निपटाने के लिए दो या तीन न्यायाधीशों की उच्चतम न्यायालय की मूल-पीठ के पास वापस भेजा जाए।
मेरा पहला निवेदन यह है कि अनुच्छेद 204 में यह संशोधन जिसे आप मैंने प्रातःकाल प्रस्तुत किया है करने के मामले में हम लोग संशोधन संख्या 42 में अंतर्विष्ट अनुच्छेद 121 के खंड (2क) के परंतुक की विषय-वस्तु को शामिल करने से अधिक कुछ भी नहीं कर रहे हैं। यहां भी हमने यह कहा है कि उच्च न्यायालय, यदि संतुष्ट हो, मामले