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को स्वयं सुन सकता है, संवैधानिक कानून से संबंधित मुद्दे पर निर्णय दे सकता है और संसद द्वारा बनाए गए साधारण कानून की व्याख्या से संबंधित अन्य मुद्दों का निपटारा करने हेतु मुकदमे को अधीनस्थ न्यायाधीश के पास वापस भेज सकता है। मैं नहीं समझता कि हम लोग उच्चतम न्यायालय से संबंधित मामले में जो कुछ कर चुके हैं उसकी तुलना में कुछ भी नया, अलग या असाधारण उपबंध करने जा रहे हैं। इसीलिए मेरा निवेदन है कि यदि हम अनुच्छेद 121 के खण्ड (2क) के परंतुक को स्वीकार कर लेते हैं, जैसा कि हम पहले कर चुके हैं, तो सभा कोई बड़ी गंभीर भूल नहीं करने जा रही है या बहुत अलग हटकर कोई कार्य नहीं कर रही है.....
श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यरः महोदय, मैं इस बारे में स्पष्टीकरण चाहता हूँ और आपके प्रति बहुत ही आभार महसूस करूँगा यदि आपका यह विचार है कि अपीलीय अवस्था में उठे किसी मुद्दे तथा प्रथम न्यायालय में लंबित किसी मुकदमे के दौरान उठाए गए मुद्दे के बीच कोई भेद नहीं है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं तो केवल संशोधन की सामान्य संरचना के बारे में चर्चा कर रहा हूँ। मेरा यह कहना है कि मैंने जो संशोधन प्रस्तुत किया है वह उसी परंतुक के समतुल्य है जो हम अनुच्छेद 121 के खण्ड (2क) के मामले में जोड़ चुके हैं इसीलिए मेरा यह कहना है कि हम जो कुछ पहले कर चुके हैं, यह मामला उससे बहुत अलग हटकर नहीं है।
फिर दो प्रश्न उठाए गए हैं। एक तो निर्णय शब्द के प्रयोग के संबंध में है। यह कहा गया है कि ‘निर्णय शब्द’ की अलग तरीके से व्याख्या की गई है और वह पक्ष जिसके मामले को उच्च न्यायालय ने संवैधानिक मुद्दे का निर्धारण करने के प्रयोजन से अपने पास मंगवाया हो उच्चतम न्यायालय ने उस मामले को ले जाने की स्थिति में नहीं होगा क्योंकि अनुच्छेद 110 के अधीन हम यह कह चुके हैं कि उच्चतम न्यायालय में अपील तभी की जा सकेगी जब आदेश दिया जा चुका हो। मुद्दा यह है कि निर्णय को अनुच्छेद 110 के अर्थ के अनुरूप अथवा उसे अंतिम आदेश नहीं माना जा सकता।
खैर, उस विशेष अर्थ में अनुच्छेद 110 में प्रयुक्त शब्द ‘निर्णय’ के उपरांत एक अपील उच्चतम न्यायालय में की जा सकेगी, वैयक्तिक तौर पर मैं इस बात को नहीं समझ पा रहा हूँ कि इस संशोधन में ‘निर्णय’ शब्द का प्रयोग किए जाने से उसी प्रकार की व्याख्या क्यों नहीं हो सकती? लेकिन यदि वह तर्क सही है तो मेरे विचार से ‘जजमेंट’ शब्द के स्थान पर ‘डिसीजन’ शब्द का प्रयोग करके इसे असानी से सुधारा जा सकता है और फिर इस प्रकार का एक स्पष्टीकरण जोड़ा जा सकता है कि ‘निर्णय को अनुच्छेद 110 के प्रयोजनार्थ अंतिम आदेश के रूप में माना जाएगा।’ मैं नहीं समझता कि इस कठिनाई से नहीं बचा जा सकता।