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130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जहाँ तक अपील किए जाने का संबंध है, यह निश्चय ही उस पक्ष पर निर्भर करेगा कि वह क्या चाहता है, जिसके मुकदमे को विचार के लिए लाया गया है। संविधान की व्याख्या से संबंधित मुद्दे पर निर्णय देने के उद्देश्य से लाये गए मामले पर उच्च न्यायालय द्वारा एक बार निर्णय दे दिए जाने के पश्चात् मामले का पक्षकार सीधे उच्चतम न्यायालय जा सकता है और उस प्रश्न पर अन्तिम निर्णय प्राप्त कर सकता है या फिर वह तब तक प्रतीक्षा कर सकता है जब तक अधीनस्थ न्यायाधीश द्वारा सभी मुद्दों पर निर्णय नहीं सुना दिया जाये। उन विशेष मुद्दों पर तथ्यात्मक निष्कर्षों पर उच्च न्यायालय के माध्यम से अपील पहुँचती है और उसके बाद उस मामले को उच्चतम न्यायालय में लाया जा सकता है। यदि संविधान की व्याख्या से संबंधित मुद्दों और प्रारंभिक मुद्दों की स्थिति एक समान हो, तो हम इसके पक्षकार को किसी भी प्रक्रिया से हम बांधना नहीं चाहेंगे ताकि जब निर्णय दिया जाये, तो पूरे मामले पर निर्णय आए। मुझे इस बारे में तनिक भी संदेह नहीं है कि प्रभावित पक्षकार शेष मामलों का निपटारा करने के लिए अधीनस्थ न्यायाधीश के पास जाने की बजाय तत्काल उच्चतम न्यायालय जाने तथा संविधान की व्याख्या कराने को प्राथमिकता देगा। मुझे इसमें कोई कठिनाई नज़र नहीं आती।

अब, दूसरा प्रश्न यह उठाया गया है, मेरे मित्र श्री अलादी कृष्णास्वामी अय्यर ने वहाँ बैठे-बैठे कुछ कहा है। मैं उनकी बात नहीं सुन सका हूँ। लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर की गई बातचीत के दौरान यह उल्लेख किया था कि उच्च न्यायालय के लिए संविधान की व्याख्या से संबंधित मुद्दे तथा अन्य मुद्दों को अलग कर पाना कठिन कार्य होगा और यह हो सकता है कि अन्य मुद्दों की व्याख्या करने तथा संविधान की व्याख्या से संबंधित मुद्दों की व्याख्या करने के लिए उच्च न्यायालय अन्य मुद्दों पर भी एक साथ विचार करने को प्राथमिकता दे। यह भी सुझाव दिया गया कि मान लें कि मामला वास्तव में छोटा-सा हो, लेकिन उसमें कानून की व्याख्या का प्रश्न अन्तर्ग्रस्त हो, तो फिर उच्च न्यायालय को इतने छोटे से मामले को अधीनस्थ न्यायालय के पास वापस भेजने की बजाय उसे स्वयं ही निपटाने की अनुमति क्यों नहीं मिलनी चाहिए? अतः इन दोनों ही प्रकार की आकस्मिक स्थितियों से निपटने के लिए यह संशोधन उच्च न्यायालय को स्वयं ही मामले को निपटाने की शक्ति प्रदान करता है। मैं नहीं समझता कि इन कठिनाइयों को दूर करने के लिए ये पर्याप्त नहीं होंगे। इसलिए, मैं यह बताना चाहता हूँ कि संशोधन का उद्देश्य वही है जो हमारी मंशा है अर्थात् उच्च न्यायालय जब पूरे मामले पर विचार कर रहा है, तो उस पर सभी मुद्दों पर निर्णय देने का भार नहीं होना चाहिए, उसे संविधान की व्याख्या से संबंधित विशिष्ट प्रश्न से जुड़े विशेष मुद्दे पर निर्णय देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

मैं एक बात और कहना चाहता हूँ। इसमें कोई संदेह नहीं है कि नागरिक प्रक्रिया