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संहिता की धारा 24 में अन्तर्विष्ट शक्ति उच्च न्यायालय को इस बात की अनुमति देती है कि वह किसी भी मामले को मंगवाकर उस पर अपने मत का निर्धारण करे। लेकिन धारा 24 के मामले में कठिनाई यह है कि उसे पूरे मामले पर विचार करना होगा। उसे आंशिक रूप से मामलों पर विचार करने की शक्ति नहीं है। जबकि हमारा उद्देश्य यह है कि उच्च न्यायालय को किसी मामले के उस भाग पर सुनवाई करने की अनुमति दी जानी चाहिए जिसमें संविधान की व्याख्या का संदर्भ हो।
इसलिए, मेरा यह कहना है कि जब तक आप विशिष्ट उपबंध नहीं करेंगे जैसा कि अभी अनुच्छेद 204 के अधीन हम कर रहे हैं तो उच्च न्यायालय को पूरे मामले पर विचार करना होगा यदि वह इस संविधान की व्याख्या से संबंधित किसी प्रश्न पर निर्णय देना चाहता है।
मैं एक बात और बताना चाहता हूँ। आप सबको यह याद होगा कि कल और आज प्रातःकाल के बीच समय नहीं मिल पाया है कि खासकर इस संशोधन के शब्दों पर बारीकी से नजर डाली जा सके। मैं यह संशोधन इसलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ क्योंकि मेरे विचार से कतिपय छोटी-मोटी त्रुटियों या विसंगतियों के कारण अनुच्छेदों को स्थगित रखना बहुत गलत है। मैं इस संशोधन को प्रस्तुत करते हुए यह कहना चाहता हूँ कि मैं चाहूँगा कि प्रारूप समिति को यहाँ उल्लिखित त्रुटियों को दूर करने के लिए उसे ऐसे परिवर्तन करने का अवसर दिया जाये जो वह जरूरी समझे और इसे सभा द्वारा पारित अन्य अनुच्छेदों की तर्ज पर लाया जा सके।
माननीय सभापतिः मैं अब प्रो. शाह के संशोधन संख्या 2674 पर मत लूँगा।
श्री एच.वी. कामतः मैंने सोचा कि डॉ. अम्बेडकर के संशोधन ने इस संशोधन को अधिक्रमित कर दिया।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मैं सम्पूर्ण अनुच्छेद को प्रतिस्थापित कर रहा हूँ। आप संशोधन संख्या 2677 वापस ले सकते हैं।
माननीय सभापतिः आपका संशोधन पूरे अनुच्छेद के प्रतिस्थापन के लिए है। मैं अब आपके संशोधन पर मत लूँगा।
कुछ मामलों का उच्च प्रस्ताव हैः
न्यायालय को अंतरण 204 यदि उच्च न्यायालय संतुष्ट हो जाता है कि उसके अधीनस्थ
किसी न्यायालय में लंबित किसी मामले में इस संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का कोई सारवान् प्रश्न अंतर्ग्रस्त है जिसका अवधारण मामले के निपटारे के लिए आवश्यक है तो वह उस मामले को अपने पास मंगवा लेगा_ और
(क) मामले को स्वयं निपटा सकेगा, या