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न्यायालय के पदाधिकारियों और सेवकों की सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जैसा कि ऐसे न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति अथवा उस न्यायालय का ऐसा न्यायाधीश या पदाधिकारी जिसे मुख्य न्यायाधिपति ने उस प्रयोजन के लिये नियम बनाने को प्राधिकृत किया है, नियमों द्वारा विहित करेः-
परन्तु इन पदाधिकारियों और सेवकों को, या के बारे में दिये जाने वाले वेतन, भत्ते और निवृत्ति वेतन न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा उस राज्य के राज्यपाल से परामर्श करके, जिसमें उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान है, निश्चित किये जायेंगे।
(3) उच्च न्यायालय के प्रशासकीय व्यय जिनके अंतर्गत उस न्यायालय के पदाधिकारियों और सेवकों को दिये जाने वाले सभी वेतन, भत्ते और पेंशन हैं, और न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते भी हैं, राज्य के राजस्व पर भारित होंगे तथा उस न्यायालय द्वारा ली गई फीसें और अन्य धन उस राजस्व का भाग होंगी।
माननीय सभापति ः एक संशोधन श्री कपूर का भी है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान्, इस संशोधन पर मेरा एक संशोधन है। यदि आपकी अनुमति हो तो मैं उसे प्रस्तुत करना चाहता हूँ।
माननीय सभापति ः आप उसे प्रस्तुत कर सकते हैं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमान्, मेरा प्रस्ताव है किः
‘‘संशोधन की सूची के संशोधन संख्या 2676 के सम्बन्ध में, प्रस्तावित अनुच्छेद 205 के खण्ड (2) के परन्तुक के स्थान पर निम्नलिखित परन्तुक रखा जायेः-
(परन्तु इस खण्ड के अधीन बनाये गये नियमों के लिये, जहाँ तक कि वेतनों, भत्तों, छुट्टी या पेंशन से सम्बद्ध है, उस राज्य के राज्यपाल के जिसमें उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान है, अनुमोदन की अपेक्षा होगी।)
श्रीमान्, ये उपबंध उच्चतम न्यायालय सम्बन्धी उपबन्धों के समान ही है।
माननीय सभापति ः श्री कपूर इससे आपके संशोधन का आशय पूरा हो जाता है।
श्री जसपतराय कपूर (संयुक्त प्रान्तः जनरल)ः जी हाँ, श्रीमान्, इससे अब मेरे संशोधन की आवश्यकता नहीं रह गई है।
[ डॉ. अम्बेडकर का संशोधन स्वीकृत हुआ। संशोधित रूप में अनुच्छेद 205 संविधान का भाग बन गया।) ]
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