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इस विषय के सम्बन्ध में जिन विभिन्न संशोधनों का मैंने प्रस्ताव किया है उनमें वे परिवर्तन होंगे। पहला परिवर्तन यह है कि बिना किसी विधि को प्रवर्तन में लाये हुए कोई कर नहीं लगाया जायेगा। यदि लोगों पर कोई कर लगाना होगा तो इसके लिये यह आवश्यक होगा कि उसकी संपुष्टि किसी विधि द्वारा हो। इस प्रकार का उपबन्ध अनुच्छेद 248 में है, जिस पर आगे चल कर विचार किया जायेगा। सभा के सम्मुख पूर्ण चित्र प्रस्तुत करने के लिये ही मैंने उसकी चर्चा की है। संविधान के वर्तमान मसौदे में इस प्रकार का कोई उपबन्ध नहीं था। दूसरी नई बात संचित-निधि का उल्लेख है। यह अनुच्छेद 248 (क) द्वारा किया जायेगा और इस पर आगे चल कर विचार होगा। सम्भव है संसद एक आकस्मिकता निधि को भी स्थापित करना चाहे और इसलिये हम उसके सम्बन्ध में भी उपबन्ध रखना चाहते हैं। वे उपबन्ध नवीन अनुच्छेद 248-(ख) में रखे जायेंगे।
मेरे विचार से प्रथम उपबन्ध की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है, अर्थात् इसकी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है कि कोई कर बिना विधि को प्रवर्तन में लाये हुए नहीं लगाया जायेगा। यह बहुत ही उपयुक्त उपबन्ध है। वास्तव में बिना संसद की स्वीकृति प्राप्त किये कार्यपालिका के पास लोगों पर कर लगाने की शक्ति नहीं होनी चाहिए। जहाँ तक संचित निधि का सम्बन्ध है, यह कोई नया विचार नहीं है, केवल शब्दावली नई है। वर्तमान शब्दावली इस प्रकार है-‘‘भारत के गवर्नर जनरल का लोक-लेखा’’। यदि माननीय सदस्य ‘‘कम्पाइलेशन ऑफ़ ट्रेजरी रूल्स, अंक 1’’ नाम की पुस्तक को देखें तो उन्हें ज्ञात होगा कि ‘‘संचित-निधि’’ को भी ‘‘लोक-लेखा’’ कहा गया है। मैं उसमें दी हुई परिभाषा को पढ़ कर सुनाता हूँः ‘‘केन्द्रीय सरकार के लोक-लेखे से अभिप्रेत है संचित निधि, जिसमें अधिनियम की धारा 136 में परिभाषित गवर्नर जनरल का राजस्व-धन जमा किया जाता है और रखा जाता है और जिससे धन निकाल कर सरकार व्यय करती है अथवा उसकी ओर से व्यय किया जाता है।
इसलिये ‘‘संचित-निधि’’ शब्दों के प्रयोग से केवल नाम में परिवर्तन हुआ है, क्योंकि इससे केन्द्रीय सरकार का लोक-लेखा ही अभिप्रेत है।
संचित-निधि की कल्पना एक महत्वपूर्ण धारणा पर आधारित है। इस सभा के सदस्यों को यह विदित ही होगा कि इंगलैंड में संचित-निधि को स्थापित करने का विचार प्रथम बार 1777 में उठा था। उसे स्थापित करने का उद्देश्य क्या था, इसे मैं बताऊँगा। आरम्भ में संसद करों के लिये स्वीकृति देती थी और उन्हें सम्राट् लगाता था। वही करों को संगृहित करता था और जिस काम के लिये भी उचित समझता था, व्यय करता था। प्रायः यह होता था कि सम्राट् किन्हीं कामों के लिये कर लगाने की मांग करता था किन्तु अन्य कामों में उसे व्यय कर देता था। करों के लिए स्वीकृति प्रदान करने के