अनुच्छेद 90-(जारी) - Page 156

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अथवा उसे कम करती है। यह किसी कटौती प्रस्ताव पर आधृत सभा के संकल्प द्वारा किया जाता है। इतना हो जाने पर वर्तमान प्रक्रिया के अधीन अनुच्छेद 94 का अनुसरण किया जाता है अर्थात् राष्ट्रपति यह प्रमाणित करता है कि संसद के सम्मुख जो विभिन्न शीर्षक रखे गये थे, उनके सम्बन्ध में सभा ने क्या उपबन्धित किया है। नवीन उपबन्ध इस प्रकार है कि राष्ट्रपति के प्रमाणीकरण के स्थान पर विधानमण्डल एक समुचित विनियोग अधिनियम स्वीकार करे।

संविधान के मसौदे के अनुच्छेद 94 में विहित उपबन्धों के स्थान पर विनियोग-विधेयक की प्रक्रिया को रखने के पक्ष में यह तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है। विधानमण्डल प्रदायों पर मत देकर उन्हें स्वीकार करता है और इसलिये यह उचित ही है कि उसने जो कुछ स्वीकार किया है, उसे अधिनियम का रूप दिया जाये। प्रदायों पर मत देकर उन्हें स्वीकार करने का जो कार्य विधानमण्डल ने किया हो, उसका प्रमाणीकरण राष्ट्रपति अर्थात् कार्यपालिका के लिए क्यों छोड़ा जाये? हमें मुख्यतः इसी प्रश्न पर विचार करना है। वित्त के सम्बन्ध में संसद सर्वशक्ति सम्पन्न है क्योंकि अनुच्छेद 93 के उपबन्धों के अधीन बिना संसद की स्वीकृति के धन व्यय नहीं किया जा सकता। यदि किसी शीर्ष के अधीन किसी व्यय को संसद ने स्वीकार किया हो तो उसे प्रमाणित करने के लिए समुचित प्राधिकारी संसद ही है न कि राष्ट्रपति। इसलिये संविधान के इस मसौदे के अनुच्छेद 94 में विहित प्रक्रिया के स्थान में विनियोग अधिनियम की प्रक्रिया रखी जा रही है।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि भारत सरकार के 1935 के अधिनियम में अनुच्छेद 94 का समुचित स्थान था क्योंकि गवर्नर जनरल को इसे प्रमाणित करने का अधिकार था कि वह स्वविवेक से इसका निर्णय करे कि अपने कृत्यों के पालनार्थ उसे कितने धन की आवश्यकता होगी। जिन कृत्यों के सम्बन्ध में गवर्नर जनरल स्वविवेक से धन व्यय करना चाहता था, वे संसद के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत नहीं आते थे। उसे धन-राशि में परिवर्तन करने का अथवा उसे बढ़ाने का अधिकार प्राप्त था। इसलिये यह आवश्यक था कि प्रमाणीकरण के लिये अन्तिम प्राधिकारी गवर्नर जनरल ही हो क्योंकि उसे स्वतंत्र रूप से यह शक्ति प्राप्त थी कि वह अपने विशेष कृत्यों के निर्वहन के लिये आय बजट में अपनी इच्छानुसार उपबन्ध रखे। हमारे नवीन संविधान के अधीन राष्ट्रपति को अपने व्यक्तिगत निर्णय से, अथवा स्वविवेक से, किसी भी कृत्य का निर्वहन नहीं करना होगा। इसलिये कतिपय सेवाओं के व्यय के लिये धन प्रदान करने में उसका कोई हाथ नहीं होगा। इस दशा में नवीन संविधान के अधीन प्रमाणीकरण की प्रक्रिया बिल्कुल अनावश्यक है। मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि जिन देशों में भी संसदीय शासन है, वहाँ अर्थात् कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका और इंग्लैंड में विनियोग-प्रक्रिया प्रयोग में है। मैं यह भी बताना चाहता हूँ कि जब 1935 में भारत सरकार के अधिनियम पर विचार विमर्श हो रहा था तो सैक्रेटरी ऑफ स्टेट ने स्वयं यह प्रस्ताव किया था कि विधानसभा द्वारा स्वीकृत