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के उपबन्धों का स्थान लेना है जो कि गवर्नर-जनरल द्वारा एक अनुसूची के प्रमाणीकरण के विषय में था।

माननीय डॉ.बी.आर. अम्बेडकरः अध्यक्ष महोदय, मैंने तो सोचा था कि मेरे मित्र श्री टी. कृष्णमाचारी ने जो बातें कहीं थीं, उनसे मेरे मित्र श्री सन्तानम् की आपत्तियों का काफी उत्तर मिल गया होगा, किन्तु मेरे मित्र श्री भारती ने अपने वक्तृता में ये संकेत किया है कि कम से कम उनके संदेह दूर नहीं हुए हैं, अतः मैं कुछ शब्द कहना आवश्यक समझता हूँ। मेरे मित्र श्री सन्तानम् ने कहा था कि हम विनियोजन विधेयक की प्रक्रिया को व्यर्थ ही अपने यहाँ लागू कर रहे हैं, और कि हमारे प्रयोजन के लिए प्रमाणीकृत अनुसूची की वर्तमान प्रक्रिया ही पर्याप्त है। यदि मैं ठीक समझा हूँ तो उनकी युक्ति यह है कि हाउस ऑफ कामन्स में विनियोजन विधेयक इसलिये आवश्यक है कि प्राक्कलनों के अनुदानों को समस्त सदन की समिति स्वीकार करती है, सदन स्वयं नहीं करता। परिणामतः उनके मतानुसार, विनियोजन विधेयक, आवश्यक प्रक्रिया बन जाती है, क्योंकि प्राक्कलनों पर सदन में कोई समिति विचार करती है। वैयक्तिक रूप में मेरा ख्याल है कि हाउस ऑफ कामन्स की समिति प्रक्रिया और विनियोजन विधेयक की आवश्यकता में कोई सम्बन्ध नहीं है। मैं सदन को बता देता हूँ कि प्राक्कलनों के विषय में हाउस ऑफ कामन्स के समिति रूप में बैठने की प्रक्रिया कैसे आरम्भ हुई थी। सदन को याद होगा कि इंग्लैंड के राजनैतिक इतिहास में एक समय था जबकि बादशाह और हाउस ऑफ कामन्स दोनों में वैमनस्य था। आज हाउस ऑफ कामन्स और बादशाह में भरोसे और विश्वास की जो सुखद भावना विद्यमान है, वह उस समय नहीं थी। बादशाह को अत्यचारी समझा जाता था, अन्यायी समझा जाता था, जिसे केवल कर आरोपण करके धन इकट्ठा करने और उसे अपनी इच्छानुसार व्यय करने से ही मतलब था। यह भी समझा जाता था कि हाउस ऑफ कामन्स का अध्यक्ष, सदन द्वारा निर्वाचित तथा उसका विश्वासपात्र होने के स्थान पर बादशाह के गुप्तचर के समान था। इसके फलस्वरूप हाउस ऑफ कामन्स के सदस्यों को सदा यह आशंका रहती थी कि यदि सारा सदन प्राक्कलनों पर विचार करेगा, तो अध्यक्ष को ही वहाँ अध्यासीन होने का अधिकार होगा और शायद वह, बादशाह के आचरण, उसकी फिजूलखर्ची और अत्याचार के कार्यो की आलोचना करे। अतः अध्यक्ष से पीछा छुड़ाने के लिए जैसा कि मैं आरम्भ में ही कहा चुका हूँ कि जो हाउस ऑफ कामन्स की कार्यवाही के समाचार बादशाह को देता था। बादशाह का गुप्तचर समझा जाता था। उन्होंने समिति के रूप में बैठने का यह उपाय निकालाः क्योंकि जब सदन समिति रूप में बैठता है तब अध्यक्ष को पीठासीन होने का कोई हक नहीं होता। इसी मुख्य उद्देश्य को लेकर हाउस ऑफ कामन्स सप्लाई समिति के रूप में बैठता है। जैसा कि मैंने कहा है, यदि सदन सप्लाई समिति के रूप में न भी बैठता तब भी सदन के लिये विनियोजन विधेयक पारित करना आवश्यक होता। जैसा कि मेरे मित्रों-कम से कम वकील मित्रों को