अनुच्छेद 94 - Page 163

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्मरण होगा, एक समय था जबकि हाउस ऑफ कामन्स जब वेज एंड मीन्स समिति के रूप में केवल प्रस्ताव पारित कर देता था कि कौन से कर लगाये जायें और तत्पश्चात् उन प्रस्तावों के आधार पर काफी समय तक कर वसूल किये जाते रहे-मेरे ख्याल में 1913 तक। सन् 1913 में यह प्रश्न न्यायालय में चला गया कि क्या वेज एंड मीन्स समिति के प्रस्तावों के ही आधार पर कर लगाये जा सकते हैं, और उच्च न्यायालय ने निश्चय कर दिया कि हाउस ऑफ कामन्स को केवल प्रस्तावों के आधार पर कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है। सदन को कर लगाने के लिये अधिनियम पारित करना चाहिये। परिणामतः संसद ने प्रान्तीय कर एकत्रण अधिनियम नामक विधि बनाई। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है कि यदि सप्लाई समिति में व्यय पर मतदान होता और हाउस ऑफ कामन्स के संकल्पों को अंतिम प्राधिकार समझा जाता तो न्यायालय उनकी भी निंदा करते, क्योंकि यह एक सुनिश्चित सिद्धांत है कि विधि प्रवर्तन में आती है, संकल्प नहीं। अतः मेरा पहला निवेदन यह है कि मेरे मित्र श्री सन्थानम की यह युक्ति सर्वदा निराधार है कि विनियोजन विधेयक हाउस ऑफ कामन्स की समिति प्रक्रिया का ही अभिन्न अंग है। मैं पहले ही निवेदन कर चुका हूँ कि गवर्नर जनरल द्वारा प्रमाणीकृत अनुसूची की प्रक्रिया क्यों अनावश्यक है, यह देखते हुए कि परिवर्तित स्थिति में राष्ट्रपति के स्वविवेक संबंधी कोई कृत्य नहीं होंगे, और वित्तीय मामलों में संसद की शक्ति सर्वोपरि होगी और राष्ट्रपति या कार्यपालिका की नहीं। इस विषय पर मुझे और कुछ नहीं कहना है।

फिर यदि मैं ठीक समझा हूँ तो मेरे मित्र श्री सन्थानम ने कहा, कि अनुच्छेद 95 मुझे पता नहीं कि उन्होंने अनुच्छेद 96 की चर्चा की थी या नहीं-पर उन्होंने निस्संदेह अनुच्छेद 95 की चर्चा की थी-उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 95 से नये अनुच्छेद 94 का खंड (3) प्रभावहीन हो जायेगा। खण्ड (3) में लिखा है कि विधि द्वारा बनाये गये विनियोजन के अतिरिक्त कोई धन खर्च नहीं किया जायेगा। लगता है कि उनके ख्याल में नये अनुच्छेद 95 में उल्लिखित अनुपूरक, अपर अथवा अधिकाई अनुदान और नये अनुच्छेद 96 में उल्लिखित लेखानुदान, प्रत्ययानुदान अथवा अवादानुदान पर विनियोग विधि के बिना ही मतदान हो जायेगा। मेरे ख्याल में उन्होंने अनुच्छेद को पूरा नहीं पढ़ा है। यदि वे नये अनुच्छेद 95 के उप-खण्ड (2) को पढ़ते, और नये अनुच्छेद 96 के अंतिम भाग को भी पढ़ते और आगे चल कर एक और अनुच्छेद को भी पढ़ते जो कि बाद में पेश किया जायेगा-अर्थात् अनुच्छेद 248-क को -तो वे देखेंगे कि एक उपबंध बनाया गया है कि अनुपूरक अथवा अपर अनुदानों के लिये या तो लेखानुदान के लिये या किसी और प्रयोजन के लिये, कोई धन नहीं निकाला जा सकता, जब तक संचित निधि में से धन निकालने के लिये विधि द्वारा कोई उपबंध न बना दिया जाये। मैं यह अच्छी तरह समझ सकता हूँ कि इस बात से कई सदस्यों के समझने में गड़बड़ हो गई है कि किसी स्थान पर हम संचित निधि का उल्लेख करते हैं तो अन्य स्थान पर हम विनियोजन अधिनियम