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की चर्चा करते हैं। बात यह हैः संचित निधि अधिनियम और विनियोजन अधिनियम में मूलतः कोई अन्तर नहीं है। दोनों का एक ही उद्देश्य है, कि नियमित रूप से नियुक्त प्राधिकारी को संचित निधि में से धन निकालने के लिये प्राधिकृत करना। संचित निधि अधिनियम और विनियोजन अधिनियम में केवल यही अन्तर है। संचित निधि अधिनियम में एकमुश्त राशि का उल्लेख होता है, पर विनियोजन अधिनियम में सब विस्तृत विवरण होता है-मुख्य शीर्ष, उप-शीर्ष और मदें। स्पष्टतः विनियोजन विधेयक की प्रक्रिया को संचित निधि विधेयक के समय पूरा नहीं किया जा सकता, क्योंकि संसद ने शीर्ष, उप-शीर्ष और उप-शीर्ष की मदों के लिये धन का विनियोजन करने के पूरे उपक्रम को पूरा नहीं किया है। परिणामतः जब संचित निधि अधिनियम में धन पर मतदान होता है तो इसका अर्थ यह है कि कार्यपालिका संचित निधि में से इतनी एक-मुश्त राशि निकाल सकती है, जो बाद में अंतिम विनियोजन अधिनियम में दिखाई जायेगी। यदि माननीय मित्र यह याद रखेंगे कि कार्यपालिका का संचित निधि अधिनियम या विनियोजन अधिनियम के अतिरिक्त धन निकालने का कोई प्राधिकार नहीं है, तो वे समझ जायेंगे कि यथासंभव इन उप-बन्धों को ऐसा बनाया गया है कि धोखा करना या चालाकी करना संभव न हो सके।
[ (डॉ. अम्बेडकर का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। यथा संशोधित रूप में अनुच्छेद 94 संविधान में जोड़ा गया।),
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अनुच्छेद 95
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमान्, मैं प्रस्ताव करता हूँः
‘‘कि अनुच्छेद 95 के स्थान पर, निम्न अनुच्छेद रख दिया जायेः 95. (1) यदि
(क) अनुच्छेद 114 के उपबन्धों के अनुसार निर्मित किसी विधि द्वारा किसी विशेष सेवा पर चालू वित्तीय वर्ष के लिये व्यय किये जाने के लिए प्राधिकृत कोई राशि उस वर्ष के प्रयोजनों के लिये अपर्याप्त पाई जाती है अथवा जब उस वर्ष के वार्षिक वित्त विवरण में अपेक्षित न की गई किसी नई सेवा पर अनुपूरक अथवा अपर व्यय की अनुपूरक, चालू वित्तीय वर्ष में आवश्यकता पैदा हो गई है, अथवा अपर या (ख) किसी वित्तीय वर्ष में किसी सेवा पर उस सेवा और उस वर्ष के लिये अतिरिक्त अनुदान की गई राशि से अधिक कोई धन व्यय हो गया है, तो राष्ट्रपति अनुदान यथास्थिति संसद के दोनों सदनों के समक्ष उस व्यय की प्राक्कलित की
गई राशि को दिखाने वाला दूसरा विवरण रखवायेंगे अथवा लोक-सभा में ऐसी अधिकाई के लिये मांग उपस्थित करायेगा।
(2) ऐसे किसी विवरण और व्यय या मांग के सम्बन्ध में, तथा भारत की संचित