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राष्ट्रपति विधि के अनुसार वे ही प्राक्कलन पेश कर सकता है। इसका यह अर्थ होगा कि अनुपूरक मांगों, अनुपूरक अनुदानों, अधिकाई अनुदानों अथवा अन्य अनुदानों के लिये कोई उपबन्ध नहीं होगा, जिनका उल्लेख लेखानुदान आदि के रूप में किया गया है। यदि अनुपूरक अनुदानों और अन्य अनुदानों को, जिनका मैंने उल्लेख किया है, पेश करने के लिये कोई उपबन्ध नहीं किया जायेगा, तो कार्यपालिका का सब काम ही रुक जायेगा। अतएव, यह सामान्य उपबन्ध बना कर कि राष्ट्रपति उस वर्ष विशेष के व्यय के प्राक्कलनों को संसद के समक्ष पेश करने के लिये बाध्य होगा, उसे यह भी प्राधिकार दे दिया गया है कि यदि आवश्यकता पड़ जाये तो वह अन्य प्राक्कलन भी पेश कर सकता है। अतः यदि हम संविधान में, अनुपूरक और अधिकाई अनुदानों के लिये कोई स्पष्ट उपबन्ध नहीं करते, तो अनुच्छेद 92, 93 (2) और 94 के कारण वे पेश नहीं हो सकेंगे। अब सदन यह समझ जायेगा कि इन अनुपूरक अनुदानों को पेश करने के लिये यह उपबन्ध रखना क्यों अपेक्षित है।
अतिरिक्त मांगों के विषय में प्रश्न उठा है। मेरे विचार में कठिनाई स्वाभाविक है। सदस्यों ने कहा है कि जब यह उल्लेख कर दिया गया है कि विनियोजन अधिनियम द्वारा निश्चित सीमा के अलावा कार्यपालिका कोई धन व्यय नहीं कर सकेगी, तो अतिरिक्त अनुदानों का प्रश्न कैसे उठ सकता है? मेरे विचार में यही बात है। इसका उत्तर यह है। मेरे मित्र, पंडित कुंजरू द्वारा पेश किये गये संशोधन के अनुसार ही हम उपबन्ध बना रहे हैं, जो कि सूची 1 के पृष्ठ 27 पर नया अनुच्छेद 248 ख है, जिसमें कि भारत की संचित निधि में से एक आकस्मिकता निधि स्थापित करने का उपबन्ध है। वैयक्तिक रूप में मैं नहीं समझता कि ऐसा उपबन्ध अपेक्षित है। क्योंकि यही प्रश्न आस्ट्रेलिया में उठा था, न्यू साउथ वेल्स के राज्य और कामनवैल्थ ऑफ आस्ट्रेलिया के मध्य मुकदमे में उठा था, और उसमें यह प्रश्न आया था कि कामनवैल्थ को एक आकस्मिकता निधि स्थापित करने का अधिकार है, जबकि विधि में यह उल्लेख है कि समस्त राजस्व को संचित निधि में एकत्र कर दिया जाये और आस्ट्रेलियन कामनवैल्थ को उच्च न्यायालय ने यह उत्तर दिया कि संचित निधि की स्थापना से संसद के विधानमंडल को यह वर्जन नहीं हो जाता कि वह संचित निधि में से कोई अन्य निधि स्थापित कर सके, चाहे वह निधि विशेष उसी वर्ष में खर्च क्यों न की जाये, क्योंकि यह तो केवल विनियोजन है, चाहे दूसरे रूप में हो। किन्तु नये अनुच्छेद 248ख को रखने के विषय में मैं अपने मित्र पंडित कुंजरू के संशोधन को स्वीकार कर लूँगा, जिससे कि इस विषय में कोई संदेह न रहे कि संचित निधि के उपबन्ध के रहते हुए क्या संसद को आकस्मिकता निधि स्थापित करने का अधिकार है। अतः यह सम्भव है कि कार्यपालिका को विनियोजन अधिनियम के आधार पर जो निधि दी जाती है, उसके अतिरिक्त भी कार्यपालिका के पास संचित निधि होगी और ऐसी अन्य निधि भी होगी जो कि विधि द्वारा समय-समय पर बनाई