अनुच्छेद 96 - Page 168

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माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अनुपूरक विनियोजन भी हो सकता है। हाउस ऑफ कामन्स में सदा ऐसा ही होता है।

प्रो. शिब्बनलाल सक्सेनाः मेरे संशोधन का क्या हुआ, श्रीमान्?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मुझे बहुत खेद है। प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना कहते हैं कि वित्तीय वर्ष को बदल दिया जाये। खैर, मुझे तो केवल यही कहना है कि मुझे संदेह है कि उनका उद्देश्य साफ नहीं है। वे शायद शरद् सत्र चाहते हैं जिससे कि वे जितना चाहें उतना कात सकें। यदि वे लम्बे सत्र चाहते हैं तो उन्हें गर्मी के मासों में बैठना चाहिए, जैसा हम आजकल कर रहे हैं।

[ (डॉ. अम्बेडकर का संशोधन स्वीकृत हुआ। यथासंशोधित रूप में अनुच्छेद 95 संविधान में जोड़ा गया।) ]

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अनुच्छेद 96

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमान्, मैं प्रस्ताव करता हूँः

‘‘कि अनुच्छेद 96 के स्थान पर निम्न अनुच्छेद रख दिया जायेः 96. (1) इस अध्याय के पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी

लोक-सभा को-

लेखा अनुदान (क) किसी वित्तीय वर्ष के भाग के लिये प्राक्कलित व्यय के बारे प्रत्यानुदान तथा में किसी अनुदान को, ऐसे अनुदान के लिये मतदान करने के लिये अपवादानुलन अनुच्छेद 93 में विहित प्रक्रिया की पूर्ति के लम्बित रहने तक, तथा

उस व्यय के सम्बन्ध में अनुच्छेद 94 के उपबन्धों के अनुसार विधि के

पारण के लम्बित रहने तक, पेशगी देने की,

(ख) जब कि किसी सेवा की महत्ता या अनिश्चित रूप के कारण मांग वैसे

ब्यौरे के साथ वर्णित नहीं की जा सकती जैसा कि वार्षिक वित्त विवरण में

साधारणतया दिया जाता है, तब भारत के सम्पत्ति स्रोतों पर अप्रत्याशित मांग

की पूर्ति के लिये अनुदान करने की,

(ग) किसी वित्तीय वर्ष की चालू सेवा का जो अनुदान भाग न हो ऐसा कोई

अपवादानुदान करने की,

शक्ति होगी तथा उक्त अनुदान जिन प्रयोजनों के लिये किये गये हैं उनके लिये भारत की संचित निधि में से धन निकालना विधि द्वारा प्राधिकृत करने की शक्ति होगी।

(2) खण्ड (1) के अधीन किये जाने वाले किसी अनुदान तथा उस खंड के

अधीन बनाई जाने वाले किसी विधि के सम्बन्ध में अनुच्छेद 93 और 94