164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय सभापतिः मैं संशोधन पर मतदान करने से पूर्व डॉ. अम्बेडकर से पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्हें कुछ कहना है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अब तक बहुत कुछ कहा जा चुका है। जब तक आप बोलने को नहीं कहते मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा।
माननीय सभापतिः वह आपकी इच्छा है।
(डॉ. अम्बेडकर द्वारा संशोधित रूप में अुनच्छेद 226 स्वीकृत हो गया ओर संविधान में जोड़ा गया।)
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अनुच्छेद 229
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमान्, मैं प्रस्ताव करता हूँः
फ्कि संशोधनों की सूची के संशोधन संख्या 2781 ओर 2783 के निर्देश से अनुच्छेद 229 के खण्ड (1) के स्थान पर निम्न खण्ड रखा जाएः
¹(1) यदि किन्हीं दो अथवा अधिक राज्यों के विधानमंडलों को यह वांछनीय
प्रतीत हो कि उन विषयों में से, जिनके बारे में संसद को, इस संविधान के
अनुच्छेद 226 और 227 में उपबन्धित रीति के अतिरिक्त, उन राज्यों के
लिए विधि बनाने की शक्ति नहीं है, किसी विषय का विनियमन ऐसे राज्यों
में संसद विधि द्वारा करे तथा यदि उन राज्यों में से प्रत्येक विधानमंडल के
सदन अथवा जहाँ दो सदन हों वहां दोनों सदनों ने उसके लिए संकल्पों
का पारण किया है, तो उस विषय का तद्नुकूल विनियमन करने के लिए
किसी अधिनियम का पारण करना संसद के लिए विधि-संगत होगा तथा
इस प्रकार पारित कोई अधिनियम ऐसे राज्यों पर लागू होगा तथा किसी अन्य
राज्य को, जो तत्पश्चात् अपने विधानमंडल के सदन अथवा जहाँ दो सदन
हों, वहां दोनों सदनों में से प्रत्येक से उस लिए पारित संकल्प द्वारा उसको
अंगीकार करे लगा होगा।ह्
थोड़े से संक्षिप्त वाक्यों में मैं इस संशोधन की व्याख्या करना चाहूँगा। जिस रूप में मूल अनुच्छेद था उसमें कहा गया थाः फ्यदि एक अथवा अधिक राज्यों के विधानमंडल अथवा विधान मंडलों को यह वांछनीय प्रतीत हो, इत्यादि-इत्यादि।य् नए संशोधन में कहा गया हैः फ्यदि किन्हीं दो अथवा अधिक राज्यों के विधानमंडलों को यह वांछनीय प्रतीत हो, इत्यादि-इत्यादि।य् नए संशोधन के अधीन विधि बनाने के लिए संसद की
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 7 जून, 1949, पृ. 799-800
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