अनुच्छेद 111-क - Page 192

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गई है। सो इन तीन तरह के मामलों में, उस सिद्धांत की कि जिस व्यक्ति को मृत्यु-दण्ड मिला हो, उसे कम से कम एक अपील का अधिकार होना ही चाहिए, सर्वथा उपेक्षा की गई है। मैं समझता हूँ कि इस बात को देखते हुए कि वर्तमान युग तथा भारतीय जनता पर्याप्त रूप से विवेक सम्पन्न हो गई है, ऐसा प्रावधान होना ही चाहिए। उपखण्ड (क) और (ख) का उद्देश्य यही है कि ऐसे मामलों में जहाँ अभियुक्त व्यक्ति को प्रथम बार के न्यायालय में तो विमुक्त कर दिया गया हो, पर उच्च न्यायालय ने उसे मृत्यु दण्डादेश दिया हो, अपील का अधिकार प्राप्त रहे। मैं नहीं समझता कि सद्विवेक या मानवता का

खयाल रखते हुए कोई भी व्यक्ति ऐसा होगा जो उप-खण्ड (क) और (ख) में रखे गए प्रावधानों के विरुद्ध कोई आपत्ति उठाएगा।

अब मैं उपखण्ड (ग) को लेता हूँ। सभा को यह स्मरण होगा कि दण्ड-प्रक्रिया-संहिता की धारा 411 के अधीन, जहां तक कि कलकत्ता, बम्बई और मद्रास के उच्च न्यायालयों का सम्बन्ध है, आज भी यह प्रावधान प्रवर्तन में है। 1943 में विधानमण्डल द्वारा यह अधिकार प्राप्त किया गया था कि अगर उच्च न्यायालय यह प्रमाणित करता है कि मामला अपील के लायक है तो प्रिवी कौंसिल में मामले की अपील की जा सकती है। यह जानबूझकर प्रदत्त किया गया था। इसलिए, दण्ड प्रक्रिया-संहिता की धारा 411 में जो प्रावधान हैं, उसके सम्बन्ध में हमारे सामने दो ही प्रश्न हैं। या तो उस प्रावधान को बिल्कुल ही हटा दिया जाए या इसे अन्य उच्च न्यायालयों के लिए भी लागू कर दिया जाए। धारा 411 के प्रावधानों को, जिनके अनुसार उच्च न्यायालय के यह प्रमाणित करने पर कि मामला अपील के लायक है किसी मामले की अपील की जा सकती है, अगर हटा दिया जाता है तो इसका मतलब यह होगा कि आप एक चालू अधिकार को, जिसको जनता तीन भिन्न प्रान्तों में प्रयोग में लेती आई है जानबूझकर हटा रहे हैं। एक ऐसे न्यायिक अधिकार को वापस लेना जो अर्से से जनता को प्राप्त रहा है, कुछ असंगत सा प्रतीत होता है। इसलिए दूसरा उपाय यही रह जाता है कि इसके प्रावधानों के दायरे को इस तरह बढ़ा दिया जाए कि अन्य सभी न्यायालयों पर वह लागू हो सके। मेरे संशोधन में यही उपाय अपनाया गया है, अर्थात् इसे अन्य उच्च न्यायालयों के सम्बन्ध में भी लागू कर दिया गया है। माननीय मित्रगण, जो इस आशंका से विचलित हो रहे हैं कि इससे उच्चतम न्यायालय में आपराधिक अपीलें की बाढ़ आ जाएगी, वह मेरी समझ से, इस सम्बन्ध में दो महत्त्वपूर्ण बातों को भूल जाते हैं। एक तो इस बात को वह भूल रहे हैं कि नवीन अनुच्छेद के खण्ड (1) के उप-खण्ड (क) और (ख) द्वारा अपील का जो अधिकार दिया जा रहा है, वह किसी भी समय, जबकि विधानमंडल मृत्युदण्ड को उठा देगा, स्वतः समाप्त हो जाएगा। मृत्युदण्ड के सम्बन्ध में आज दुनिया के सभी भागों में जो कुछ कहा जा रहा है, उसका खयाल करते हुए तथा अपनी परम्परा का खयाल करते हुए, अगर विधानमण्डल मृत्युदण्ड को उठा देता है तो फिर उच्चतम