अनुच्छेद 111-क - Page 193

174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

न्यायालय में अपील करने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी और उस हालत में यह उप-खण्ड (क) और (ख) स्वतः प्रवर्तन शून्य हो जाएंगे और उच्चतम न्यायालय का कार्यभार, जहाँ कि कि आपराधिक मामलों का सम्बन्ध है, अगर बिल्कुल ही नहीं तो बहुत कुछ कम हो जाएगा।

जहाँ तक उप-खण्ड (ग) का सम्बन्ध है, आप यह देखेंगे कि इसके साथ एक परन्तुक रख कर इस प्रावधान को सीमित कर दिया गया है। परन्तुक में कहा गया है फ्परन्तुक इस खण्ड के उप-खण्ड (ग) के अधीन होने वाली अपील, ऐसे नियमों के अधीन रह कर, जिन्हें कि उच्चतम न्यायालय समय-समय पर बनाएं, तथा ऐसी शर्तों के अधीन रहकर, जो उच्च न्यायालय द्वारा स्थापित या अपेक्षित की जाए, ही होगी।य् इसलिए प्रमाण-पत्र सम्बन्धी जो व्यवस्था है, वह ऐसी नहीं है कि प्रमाण-पत्र की माँग करते ही वह उपलब्ध हो जाएगा और उसके आधार पर अपील की खुली सुविधा मिल जाएगी। इस सम्बन्ध में, उच्च न्यायालय की जो शर्त और प्रतिबन्ध रखेगा तथा उच्चतम न्यायालय जो नियम बनाएगा उनके अधीन रहकर ही, उप-खण्ड (ग) के अधीन कोई अपील की जा सकेगी। इसलिए यह मालूम होना चाहिए कि उप-खण्ड (ग) एक बड़ा कठोर प्रावधान है। यह लचीला नहीं है और न उतना व्यापक ही है जैसा कि लोग समझ रहे हैं।

पण्डित लक्ष्मीकान्त मैत्राः परन्तुक जोड़ देने पर यह प्रावधान लचीला नहीं रह जाता है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हाँ, मैं भी यही कह रहा हूँ। परन्तुक के साथ यह प्रावधान लचीला नहीं रह जाता है।

अब मैं अपने संशोधन के खण्ड (2) को लेता हूँ। इसके द्वारा उच्चतम न्यायालय के आपराधिक क्षेत्राधिकार को और विस्तृत करने की शक्ति संसद को दी गई है और संशोधन में दिए गए तीन तरह के मामलों के अलावा अन्य मामलों के सम्बन्ध में भी संसद उसको और आपराधिक क्षेत्राधिकार प्रदान कर सकती है। इस सम्बन्ध में एक विचारधारा यहाँ यह रही है कि जो तीन तरह के मामले संशोधन के खण्ड (1) में उल्लिखित किए गए हैं, वह काफी हैं और अब इस बात के लिए रास्ता खुला नहीं रखना चाहिए संसद चाहे तो उच्चतम न्यायालय के आपराधिक क्षेत्राधिकार को और विस्तृत कर दे। उप-खण्ड (क) और (ख) द्वारा जो आपराधिक क्षेत्राधिकार यहाँ दिया गया है वह इस अधिकार के संबंध में अन्तिम सीमा होनी चाहिए इसका एकमात्र उत्तर, जो मैं दे सकता हूँ, वह यह है। यह समझना और सोचना बड़ा कठिन है कि आगे चलकर क्या स्थिति हो सकती है। पर अगर कोई व्यक्ति यह कहता है कि आगे चलकर ऐसी कोई स्थिति ही उत्पन्न नहीं होगी, जिसमें यह अपेक्षित हो कि संसद उच्चतम न्यायालय