176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का ही जिक्र है। आपका कहना यह है कि उपखण्ड (ग) को रखने में कोई लाभ नहीं है अगर परन्तुक में दिए गए प्रतिबन्धों से उसे आप जकड़ देते हैं। इस सम्बन्ध में पहली बात उन्हें यह याद दिलाऊँगा कि इस उप-खण्ड का जो परन्तुक है वह अक्षरशः उन परन्तुकों से मिलता है, जो दण्ड-प्रक्रिया-संहिता की धारा 411 के साथ तथा जो व्यवहार-प्रक्रिया-संहिता की धारा 109 के साथ रखे गए हैं। माननीय मित्र श्री अल्लादि कृष्णास्वामी को स्मरण होगा कि उच्चतम न्यायालय के व्यवहार-विषयक अपीलीय क्षेत्राधिकार के सम्बन्ध में हमने एक खण्ड ऐसा रखा है जो अनुच्छेद 111 (क) के
खण्ड (1) के उप-खण्ड (ग) से अक्षरशः मिलता हुआ है। अब मेरा कहना यह है कि अगर अनुच्छेद 111 के खण्ड (1) के उप-खण्ड (ग) को रखने में कोई लाभ है? जबकि वहाँ भी उच्चतम न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमादि के प्रतिबन्ध रखे गए हैं तो मेरी सहज बुद्धि यही कहती है कि प्रस्तुत उप-खण्ड (ग) को रखने में भी अवश्य ही लाभ है, भले ही परन्तुक के प्रावधानों द्वारा उसे भी सीमित ही क्यों न कर दिया गया है। माननीय मित्र ने यह भी कहा है कि अनुच्छेद 112 में एक प्रावधान ऐसा है जो उच्चतम न्यायालय को यह अधिकार देता है कि वह विशेष अनुमति प्रदान कर किसी भी मामले की अपील ग्रहण कर सकता है और यह अनुच्छेद व्यवहार-विषयक अपीलों तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह एक व्यापक अनुच्छेद है जिसमें किसी वाद या विषय की अपील को विशेष अनुमति द्वारा ग्रहण करने की बात कही गई है। उनका कहना यह था कि जब अनुच्छेद 112 है ही तो इस उप-खण्ड (ग) को रखने से क्या लाभ? उसके सम्बन्ध में भी मेरा वही जवाब है जो पहले दे चुका हूँ। जब अनुच्छेद 112 में यह बता ही दिया गया है कि उच्चतम न्यायालय को उच्च न्यायालय पर व्यवहार-विषयक मामलों में क्या क्षेत्राधिकार प्राप्त रहेगा तो फिर अनुच्छेद 111 के उप-खण्ड (ग) को ही रहने की क्या जरूरत है? अगर अनुच्छेद 112 में रहते हुए भी व्यवहार विषयक अपीलों के सम्बन्ध में अनुच्छेद 111 के उप-खण्ड (ग) को हम रखते हैं तो फिर अनुच्छेद 111 (क) के उपखण्ड (ग) को रखने में आपको क्या आपत्ति है? यहाँ जो बात ध्यान में रखने की है, वह यह है कि अनुच्छेद के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय को यह स्वतंत्रता दे दी गई है कि अपीलों को ग्रहण करने के बारे में जो भी शर्तें वह रखना चाहें, रख सकता है। इस सम्बन्ध में उसके क्षेत्राधिकार पर कोई प्रतिबन्ध नहीं रखा गया है।
श्री अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यरः व्यवहार-विषयक अपीलों के सम्बन्ध में तो वहाँ एक शर्त दी गई है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हाँ, यह सच है। मैं नहीं जानता कि उच्च्तम न्यायालय द्वारा इस अनुच्छेद का निर्वचन किस रूप में किया जाएगा। यह बात उच्चतम न्यायालय पर छोड़ दी गई है कि वही इसका निर्वचन करे। हो सकता है, उच्चतम