अनुच्छेद 111-क - Page 196

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न्यायालय उसका निर्वचन उसी रूप में करे, जिस रूप में कि प्रिवी कौंसिल ने किया है या वह जैसा भी चाहे उसका निर्वचन कर सकता है। हो सकता है कि उच्चतम न्यायालय इसका ऐसा निर्वचन करे जो सीमित हो या यह भी हो सकता है कि उसका निर्वचन अधिक व्यापक हो। अगर सीमित रूप में इसका निर्वचन किया जाता है तो इसमें मुझे सन्देह नहीं है कि यह उप-खण्ड (ग) कुछ काम का सिद्ध होगा। इसलिए मेरा यह कहना है, श्रीमान्, कि मेरा संशोधन ऐसा है कि इससे हमारी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है और उन लोगों की अन्तर्रात्मा को भी सन्तोष पहुँच जाता है जिनको यह आपत्ति है कि बिना एक अपील का मौका दिए किसी भी अभियुक्त व्यक्ति को कभी फांसी नहीं मिलनी चाहिए। मैं समझता हूँ कि यह संशोधन इस रूप में शब्दबद्ध किया गया है कि आपराधिक अपीलों के कारण, प्रशासन की दृष्टि से या किसी तरह, उच्चतम न्यायालय पर कभी अधिक कार्यभार नहीं पड़ेगा। आशा है मित्रगण अपने संशोधनों को अब वापस ले लेंगे और मेरे संशोधन को स्वीकार करेंगे।

श्री सी. सुब्रह्मण्यम् (मद्रासः जनरल)ः एक स्पष्टीकरण चाहता हूँ श्रीमान्। भाषा सम्बन्धी अन्तर का प्रभाव...

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अब कोई प्रश्न करने का मौका नहीं रह गया है। इसके लिए काफी देर हो चुकी है।

माननीय सभापतिः माननीय डॉ. ने अपने जवाब में यह नहीं बतलाया कि इन दो तरह के मामलों में, एक तो उनमें जिनमें कि उच्च न्यायालय ने पहले के न्यायालय द्वारा किए हुए दण्डादेश को बढ़कार मृत्यु का दण्डादेश दे दिया है और उनमें जिनमें विमुक्ति-आदेश को उलट कर उसने मृत्यु-दण्डादेश दिया है, आपने यहाँ क्या अन्तर रखा है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः दण्डदेश की वृद्धि के विरुद्ध अपील में तथा विमुक्ति-आदेश के विरुद्ध अपील में दो बातों का अन्तर है। जब उच्च न्यायालय किसी अभियुक्त-व्यक्ति को अधीन न्यायालय द्वारा दिए गए दण्डादेश में वृद्धि करता है तो वहाँ वह अभियुक्त को प्रथम बार सिद्ध-दोष नहीं ठहराता है, बल्कि वह व्यक्ति को पहले से सिद्ध-दोष ठहराया हुआ रहता है। पर विमुक्ति आदेश के विरुद्ध की गई अपील की सुनवाई में उच्च न्यायालय पहले वाले न्यायालय के निर्णय को उलट देता है और अभियुक्त व्यक्ति को सिद्ध-दोष ठहरा देता है। दूसरा अन्तर इन दोनों में यह है कि दण्डादेश की वृद्धि में कार्यवाही उस रूप में चलाई जाती है मानो कोई नियमित अपील का मामला हो और ऐसे मामले में अभियुक्त व्यक्ति को दण्ड-प्रक्रिया-संहिता के अधीन अपील का संवैधानिक अधिकार प्राप्त रहता है। वह यह बता सकता है कि न केवल दण्डादेश की वृद्धि ही अनुचित है, बल्कि मामले के तथ्यों को देखते हुए उसे दोषी ठहराना भी