अनुच्छेद 111-क - Page 197

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

औचित्य-शून्य है। दण्डादेश की वृद्धि के मामलों में एक अपील का अधिकार पहले ही से प्राप्त है। ऐसी हालत में उसमें और आगे अपील की व्यवस्था अनावश्यक है। तीसरी बात यह है कि संशोधन में दोष सिद्धि या विमुक्ति को अपील का आधार माना गया है। दण्डादेश किस तरह का है या सजा कैसी दी गई है, इसे संशोधन में अपील-विषय अधिकार का आधार नहीं माना गया है।

माननीय सभापतिः मान लीजिए किसी मामले में सेशन अदालत की राय यह है कि मामला संगीन चोट का है। पर चोट के फलस्वरूप मृत्यु होने पर भी उस मामले में अदालत कारावास का दण्ड देती है। अब फर्ज कीजिए अदालत के इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील होती है और उसकी राय यह होती है कि मामला हत्या का है, संगीन चोट का नहीं और वह मृत्यु-दण्डादेश देता है। अब यहाँ उच्च न्यायालय ने हत्या के लिए पहली बार अभियुक्त को दोषी ठहराया और मृत्यु दण्डादेश भी यहाँ पहली बार ही दिया गया है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः संशोधन में जो योजना रखी गई है, फिलहाल मैं उससे आगे जाने के लिए तैयार नहीं हूँ। आगे चलकर अगर संसद यह समझे कि ऐसे मामले में अपील का अधिकार होना चाहिए तो खण्ड (2) के अधीन उसे ऐसी व्यवस्था करने की पूरी स्वतंत्रता रहेगी।

माननीय सभापतिः यह तो दूसरी बात है और इसके बारे में फैसला देना सभा का काम है। पर जहाँ तक कि मेरा संबंध है, मैं नहीं समझ सका कि दोनों में क्या अन्तर है।

श्री एच.पी. पातस्कर (बम्बईः जनरल)ः डॉ. अम्बेडकर के मूल संशोधन संख्या 24 पर मैंने एक संशोधन पेश किया है, जो संशोधन नं. 25 है।

माननीय सभापतिः अब इसके लिए समय नहीं रह गया है। मैं समझता हूँ कि इस बात को उठाने में बड़ी देर कर दी है। अब इस मौके पर हम इस प्रश्न को उठाने की अनुमति नहीं दे सकते।

अब मैं विभिन्न संशोधनों पर राय लूँगा। जो सदस्य यह समझते हों कि डॉ. अम्बेडकर के इस नए संशोधन में उनके संशोधन की बातें आ जाती हैं, वे आशा है, कृपया अपने संशोधनों को वापस ले लेंगे।

(डॉ. अम्बेडकर का संशोधन स्वीकृत हुआ। दूसरे अधिकार संशोधन वापस ले लिए गए, एक अस्वीकृत हुआ। यथासंशोधित रूप में अनुच्छेद-तीन-क संविधान में शामिल किया गया।)

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