अनुच्छेद 167-क - Page 198

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अनुच्छेद 164

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मेरा प्रस्ताव हैः

फ्कि अनुच्छेद 164 की धारा (1) में फ्किए गए प्रावधान के अनुसार बचाएय् शब्दों के स्थान पर फ्अन्यथा किए गए प्रावधान के अनुसार बचाएँय् शब्द रख दिए जाएँ।

(चर्चा किए बगैर संशोधन स्वीकृत हुआ। यथासंशोधित अनुच्छेद 164 संविधान में शामिल किया गया।)

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अनुच्छेद 167-क

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय इस बहस के दौरान यहाँ बहुत से प्रश्न उठाए गए हैं और मैं चाहूँगा कि उनका एक-एक करके उत्तर दूँ। माननीय मित्र श्री सिंधवा की बात को अगर मैंने ठीक-ठीक सुना है तो उन्होंने अनुच्छेद 165 का जिक्र किया है, जिसमें शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने की बात कही गई है। इस अनुच्छेद के सम्बन्ध में तो यही बात है कि अगर इसके प्रावधानों की पूर्ति नहीं की जाती है तो इससे सदस्य का स्थान नहीं रिक्त हो जाता है। इस अनुच्छेद में सिर्फ यही कहा गया है कि जब तक कोई व्यक्ति शपथ न ले ले तब तक न तो वह सभा की कार्यवाही में भाग ले सकेगा और न मतदान कर सकेगा। बस, इतना ही इसमें कहा गया है। इसलिए, इसको लेकर मेरी समझ में यहाँ कोई कठिनाई पैदा नहीं होती।

श्री आर.के. सिंधवाः तो ऐसा मामला, आखिर निर्वाचन अयोग के पास ही क्यों भेजा जाए?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं उस बात की ओर आ ही रहा हूँ। जहाँ तक अनुच्छेद 165 का सम्बन्ध है, मेरा खयाल है कि इसमें और 167 में क्या बुनियादी फर्क है इसे वह समझते होंगे। अनुच्छेद 165 के सम्बन्ध में तो यही है कि शपथ न लेने पर सदस्य का स्थान रिक्त नहीं हो जाता है। उस पर केवल यह निर्योग्यता लागू हो जाती है कि वह सभा की कार्यवाही में भाग ले सकेगा।

अब मैं मुख्य संशोधन को लेता हूँ, जिसे माननीय मित्र श्री टी.टी. कृष्णामाचारी ने पेश किया है। उनका संशोधन है नवीन अनुच्छेद 167-क को रखने के बारे में। सिवाए एक बात के, जिसका कि मैं अभी-अभी उल्लेख करूँगा, अन्य सभी बातों के ख्याल से यह संशोधन बिल्वुल सही है। राज्यपाल पर फैसला देने का काम सौंपने का कारण यह है कि आम कायदे के अनुसार ऐसी अनर्हता के सम्बन्ध में निर्णय देने का भार, जिसको

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 14 जून, 1949, पृ. 860