अनुच्छेद 167-क - Page 199

180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लेकर सदस्य का स्थान रिक्त होता हो, उसी खास अधिकारी को सौंपा जाता है जिसे उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए निर्वाचन कराने की शक्ति प्राप्त रहती है। यद्यपि यह बात लिखित रूप में नहीं कही गई है पर इसे सभी अच्छी तरह समझते हैं कि अनुच्छेद 167 के वर्णित किसी अनर्हता के कारण सदस्य का स्थान रिक्त हो गया है या नहीं उसका निर्णय यही अधिकारी करेगा, जिसे उस रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए निर्वाचकों से यह कहने की शक्ति प्राप्त रहेगी कि वह उस स्थान के लिए अपना प्रतिनिधि चुने। इसके बारे में कोई सन्देह नहीं है कि अपने नवीन संविधान में राज्यपाल को ही यह शक्ति दी गई है कि निर्वाचकों से अपना प्रतिनिधि चुनने को वह कहे। ऐसी दशा में, अनर्हता सम्बन्धी कारण पर स्थान रिक्त घोषित करने की शक्ति, लाजिमी है कि राज्यपाल को ही प्राप्त रहनी चाहिए। इसलिए जहाँ तक कि अनुच्छेद 167-क के खण्ड (1) का सम्बन्ध है, उसे स्वीकार करने में मुझे कोई कठिनाई दिखाई नहीं देती।

अब मैं खण्ड (2) को लेता हूँ। यह खण्ड कुछ अधिक व्यापक हो गया है। इसमें यह कहा गया है कि अनर्हता सम्बन्धी प्रश्न का निर्णय राज्यपाल निर्वाचन आयोग को मंतव्य जानने के बाद करेगा और निर्वाचन आयोग का मंत्र मंतव्य मानने के लिए वह बाध्य होगा। यदि सदस्यगण अनुच्छेद 167 पर दृष्टिपात करें तो देखेंगे कि जहां तक (क) से (घ) तक के उपखण्डों में वणि्र्त अनर्हता का सम्बन्ध है वस्तुतः आयोग ऐसी स्थिति में नहीं है कि उनके सम्बन्ध में राज्यपाल को कोई राय दे सके क्योंकि उसमें सभी बातें ऐसी हैं जो निर्वाचन आयोग के कार्यक्षेत्र से बाहर की हैं। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति परिलाभ का कोई पद धारण करता है या कोई सदस्य विकृत मस्तिष्क का है अथवा वह अनुन्मुक्त दिवालिया है या वह किसी विदेशी सत्ता के प्रति निष्ठा रखता है, ये सब ऐसे मसले हैं जो निर्वाचन आयोग की परिधि के सर्वथा बाहर की चीजें हैं। इसलिए उन प्रश्नों के बारे में राज्यपाल को राय देने के लिए निर्वाचन आयोग को कभी भी समुचित निकाय नहीं कहा जा सकता। पर जहां तक उप-खण्ड (घ) का सम्बन्ध है, मैं समझता हूँ कि उसके बारे में निर्वाचन आयोग राय दे सकता है क्योंकि उपखण्ड (घ) के अंतर्गत अनर्हता का प्रश्न किसी भ्रष्टाचार या किसी अवांछित वृत्ति में लिप्त रहने के कारण उठ सकता है जिसमें निर्वाचन-कानून के अनुसार सदस्य को अयोग्य करार दिया जा सकता है।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः क्या निर्वाचन आयोग आवश्यक जाँच-पड़ताल नहीं कर सकता?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यहाँ जाँच-पड़ताल का प्रश्न ही कहाँ उठता है? इस बात का निश्चय करने के लिए कि कोई व्यक्ति अनुन्मुक्त दिवालिया है या नहीं जाँच-पड़ताल की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए मेरा कहना यह है कि अनुच्छेद