185
माननीय श्री के. सन्थानम् (मद्रासः जनरल)ः मेरे विचार से हम इस अनुच्छेद को स्वीकार करने में बहुत जल्दी कर रहे हैं। हम भारतीय राज्यों को प्रान्तों के अनुरूप ही बनाने का प्रयास करते रहे हैं किन्तु हम यहाँ केवल यह उपबन्धित कर रहे हैं कि पहले के प्रान्त उसी प्रकार रहेंगे किन्तु राज्यों के लिए इस प्रकार का कोई उपबंध नहीं रखा गया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः आपके संशोधन का आशय क्या है?
माननीय श्री के. सन्थानम्ः कोई संशोधन पेश नहीं कर रहा हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अध्यक्ष महोदय, मैं नहीं समझता था कि इस अनुच्छेद पर इतना वाद-विवाद होगा। किन्तु चूंकि वाद-विवाद हुआ है, इसलिए मैं यह आवश्यक समझता हूँ कि जिस भ्रम अथवा संदेह की ओर संकेत किया गया है, अथवा जो कठिनाइयाँ बताई गई हैं, उन्हें दूर करने के उद्देश्य से मैं कुछ शब्द कहूँ।
पहला प्रश्न यह उठाया गया है कि अनुच्छेद 270 को संविधान में प्रविष्ट करने की आवश्यकता ही क्या है? इसका बहुत सीधा-सादा उत्तर है। माननीय सदस्यों को यह स्मरण होगा कि 1935 के अधिनियम के प्रवर्तन में आने के पूर्व भारत सरकार की परिसंपत्तियों, दायित्वों तथा सम्पत्ति के सम्बन्ध में प्राधिकार एक निगम को प्राप्त था जो सपरिषद्-सचिव के नाम से कहा जाता था। सपरिषद्-सचिव को ही भारत के सब राजस्व तथा सम्पत्ति प्राप्त थी और उस पर भारत सरकार की सभी बाध्यताओं का दायित्व भी था। 1935 के पहले भारत सरकार एक सत्तात्मक सरकार थी। भारत सरकार की अथवा प्रान्तों की कोई सम्पत्ति नहीं थी। सब सम्पत्ति उस निगम की थी जो सपरिषद्-सचिव के नाम से कहा जाता था। उसके विरुद्ध व्यवहार-वाद उपस्थित किया जा सकता था और वह स्वयं व्यवहार-वाद उपस्थित कर सकता था। 1935 के भारत सरकार के अधिनियम द्वारा एक बहुत सारभूत परिवर्तन किया गया अर्थात् उसके अधीन भारत सराकर की ओर से सपरिषद्-सचिव को प्राप्त परिसंपत्तियां और दायित्व दो भागों में विभाजित किए गए अर्थात् भारत सरकार को बाँट में दी हुई और उसके नाम पर अलग रखी हुई परिसंपत्तियाँ और प्रान्तों के नाम पर अलग रखी हुई परिसंपत्तियाँ और दायित्व। यह सच है कि चूंकि भारत सरकार पर भारत सचिव का अधिकार पूर्णतया समाप्त नहीं हुआ था, इसलिए भारत सरकर को तथा विभिन्न प्रान्तों को बांट में दी हुई सम्पत्ति भारत सरकार के अधिनियम की धारा 172 जो कि प्रासंगिक धारा है, में इस प्रकार वर्णित की गई थी कि उसका स्वामित्व भारत सरकार की ओर से तथा विभिन्न प्रान्तों की ओर से सम्राट को प्राप्त होगा। इसके साथ ही तथ्य यह है कि दायित्व परिसंपत्तियाँ और सम्पत्ति विभाजन की गई और विभिन्न एककों तथा केन्द्र में भारत सरकार के नाम पर रखी गई। अब हमें यह समझना है कि इस संविधान को पारित करने का क्या प्रभाव होगा। इस संविधान के पारित होने