अनुच्छेद 270 - Page 205

186 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

से 1935 के भारत सरकार के अधिनियम का विरसन तथा निराकरण हो जाएगा। यदि आप निरसित अधिनियमों की अनुसूची को देखें तो आपको ज्ञात होगा कि उसमें 1935 के भारत सरकार के अधिनियम का भी उल्लेख है। यह स्पष्ट है कि जब आप भारत सरकार के अधिनियम का निरसन करने जा रहे हैं, जिसमें परिसंपत्तियों, दायित्वों और सम्पत्ति के लिए उपबंध हैं, तो आपको संविधान में किसी स्थल पर इसका उल्लेख करना होगा कि भले ही भारत सरकार के अधिनियम का निरसन हो गया हो किन्तु विभिन्न प्रान्तों की जो परिसंपत्तियाँ हैं, वे उन्हीं की रहेंगी। अन्यथा 1935 के भारत सरकार के अधिनियम के निरसित होने पर परिसंपत्तियों और दायित्वों के सम्बन्ध में कोई उपबंध न रह जाएगा। वास्तव में हम वही कर रहे हैं जो किसी अधिनियम को निरसित करने पर साधारणतया किया जाता है। साधारणतया यही कहा जाता है कि यद्यपि अमुक-अमुक अधिनियम निरसित हो गए हैं किन्तु अमुक-अमुक कार्य उसी रूप में होते रहेंगे जैसे कि वे पहले होते थे। बस इतना ही किया जा रहा है। अनुच्छेद 270 में केवल यह कहा गया है कि यद्यपि 1935 के भारत सरकार के अधिनियम का निरसन हो गया है किन्तु केन्द्रीय सरकार के विभिन्न एककों की परिसंपत्तियाँ तथा दायित्व पहले के समान ही रहेंगे। दूसरे शब्दों में 1935 के अधिनियम के अधीन जो भारत सरकार थी और जो प्रान्त थे उनके ये एकक उत्तराधिकारी होंगे। मुझे आशा है कि अब सभा की समझ में आ गया होगा कि इस खण्ड को प्रविष्ट करना क्यों आवश्यक है।

अब मैं दूसरे प्रश्न को उठाता हूँ। यह कहा गया है कि अनुच्छेद 270 में भारतीय राज्यों के दायित्वों, परिसंपत्तियों और सम्पत्ति का कोई उल्लेख नहीं है। दो मामले ऐसे हैं जिनमें विभेद करना आवश्यक है। पहले हमें उन भारतीय राज्यों को अलग श्रेणी में रखना है जो संविधान में तद्रूप समाविष्ट किए जा रहे हैं और उनके क्षेत्र तथा उनके सम्बन्ध में किसी अन्य विषय के बारे में कोई परिवर्तन नहीं किया जा रहा है। उदाहरणार्थ मैसूर राज्य को लीजिए, जो आज एक स्वतंत्र राज्य है। वह संविधान में सम्भवतः बिना किसी रूप भेद के समाविष्ट किया जाएगा। दूसरी श्रेणी उन राज्यों की है जो निकटवर्ती भारतीय प्रान्तों में समाविष्ट हो गए हैं। तीसरी श्रेणी उन राज्यों की है जिन्होंने मिलकर बड़े संघ स्थापित कर लिए हैं परन्तु जो भारतीय प्रान्तों में समाविष्ट नहीं हुए हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि मैसूर राज्य के संविधान में अनुच्छेद 270 के अनुरूप एक इस आशय का उपबंध होगा कि मैसूर की वर्तमान सरकार की परिसंपत्तियाँ, दायित्व और सम्पत्ति नवीन सरकर को प्राप्त होंगी। इसलिए इस सम्बन्ध में अनुच्छेद 270 में उपबंध रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार उन राज्यों के प्रतिज्ञापत्र में, जिन्होंने संघ स्थापित किए हैं, अनुच्छेद 270 के समान ही उपबंध होगा। उनके प्रतिज्ञापत्र में यह कहा जा सकता है कि जिन राज्यों ने मिलकर एक नवीन राज्य का निर्माण किया है उनकी परिसंपत्तियाँ तथा दायित्व संघटित राज्य की परिसंपत्तियाँ और दायित्व होंगे।