192 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय सभापतिः मेरे विचार से हम काफी वाद-विवाद कर चुके हैं और डॉ. अम्बेडकर उत्तर भी दे चुके हैं। अब अधिक वाद-विवाद करने की आवश्यकता नहीं है। अब मैं इस अनुच्छेद पर मत लूँगा।
श्री के. हनुमन्थय्या (मैसूर राज्य)ः श्रीमान्, मैं एक बात का स्पष्टीकरण चाहता हूँ। यदि डॉ. अम्बेडकर के कथनानुसार जल-प्रांगण, अर्थात् तट से तीन मील तक की भूमि संघ की होगी, तो इस अनुच्छेद की आवश्यकता ही क्या है?
माननीय सभापतिः वे प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं।
श्री के. हनुमन्थय्याः यदि डॉ. अम्बेडकर का निर्वचन ठीक है...
माननीय सभापतिः अब इस पर वाद-विवाद की आवश्यकता नहीं है। डॉ. अम्बेडकर को जो कुछ कहना था, वे कह चुके हैं। सदस्यों को उसे स्वीकार करना है। अब मैं इस अनुच्छेद पर मत लूँगा।
प्रस्ताव यह है किः
फ्अनुच्छेद 271 के पश्चात् निम्नलिखित नवीन अनुच्छेद रखा जाए- (271-क, भारत के जल-प्रांगण में, समुद्र के नीचे की सब भूमियों, खनिज तथा अन्य
जल-प्रांगण में स्थित भूमियों, खनिज तथा अन्य मूल्यवान चीजें संघ में निहित होंगी।
मूल्यवान चीजें संघ में निहित होंगी तथा संघ के प्रयोजन के लिए धारण की जाएंगी।) (प्रस्ताव स्वीकार हुआ। अनुच्छेद 271-क संविधान में जोड़ा गया।)
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अनुच्छेद 272
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमान्, मैं यह प्रस्ताव उपस्थित करता हूँः फ्कि अनुच्छेद 272 में ‘भाग 1’ शब्द और अंक जिन दो स्थानों पर आए हैं, वहीं ‘अथवा भाग 3’ शब्द और अंक प्रविष्ट किए जाएं।य्
माननीय सभापतिः डॉ. अम्बेडकर, आप क्या बोलना चाहते हैं? माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे विचार से श्री मुंशी ने सब बातें स्पष्ट कर दी हैं, और अब अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है।
(संशोधन स्वीकार हुआ। अनुच्छेद 272, संशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया)
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