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जो कार्यपालिका का भार संभालेंगे।
श्री एच.वी. कामतः सरकार अस्थायी न होगी, सरकार के पदाधिकारी भले ही अस्थायी हो सकते हैं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः भारत सरकार और भारतीय संघ में अन्तर है। भारत सरकार, विधि की दृष्टि से एकक नहीं है, भारतीय संघ विधि की दृष्टि से एकक है। वह एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न एकक हैं और उसके अधिकार तथा दायित्व हैं। इसलिए यह उचित है कि केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध जो कोई व्यवहार-वाद लाया जाए वह संघ के नाम से लाया जाए अथवा संघ के विरुद्ध लाया जाए।
फ्तत्स्थानी राज्यय् पदावली के सम्बन्ध में कुछ आपत्ति की गई है। इसमें कोई संन्देह नहीं कि यह कहना कठिन होगा कि कौन राज्य पुराने राज्य का तत्स्थानी राज्य होगा। इस कठिनाई को दूर करने के लिए अनुच्छेद 303 (1) (6) में उपबंध रखा गया है, जो संविधान के मसौदे के पृष्ठ 145 पर देखा जा सकता है। वह इस प्रकार है कि तत्स्थानी प्रान्त अथवा तत्स्थानी राज्य से संशयात्मक दशाओं में अभिप्रेत है ऐसा प्रान्त या राज्य जिसे प्रश्नास्पद विशिष्ट प्रयोजन के लिए राष्ट्रपति यथास्थिति तत्स्थानी प्रान्त अथवा तत्स्थानी राज्य निर्धारित करे। चूंकि क्षेत्र आदि में कुछ परिवर्तन होंगे और यह कहना कठिन है कि पुराने प्रान्त अथवा राज्य का तत्स्थानी प्रान्त अथवा राज्य कौन होगा। इसलिए यह कठिनाई राष्ट्रपति को यह निर्धारित करने की शक्ति देने से ही दूर हो सकती है कि किसी पुराने राज्य का तत्स्थानी राज्य कौन है। इसी कारण यह उपबन्ध रखा गया है।
उप-खण्ड (2) लम्बित कार्यवाहियों के सम्बन्ध में है और उसमें केवल यह सुझाव रखा गया है कि जब कभी कोई कार्यवाहियां लम्बित हों और जब व्यवहार-वाद लाने वाले पक्ष अथवा जिनके विरुद्ध व्यवहार-वाद लाया जाए वे पक्ष उन पक्षों से भिन्न हों जिनके सम्बन्ध में हमने उप-खण्ड (1) में उपबंध रखे हैं, तो पुरानी कार्यवाहियों में भारतीय संघ अथवा तत्स्थानी राज्य शब्द प्रविष्ट किए जाएंगे ताकि राज्यों के विरुद्ध अनुच्छेद 274 (1) के अधीन व्यवहार-वाद लाया जा सके। मेरे माननीय मित्र श्री सन्थानम् ने यह आपत्ति की है कि फ्इस संविधान से दी हुई शक्तियों के आधार परय् शब्द बिल्कुल अनावश्यक हैं और इसके सम्बन्ध में मुझे केवल यह कहना है कि मैं उनके कथन से सहमत नहीं हूँ और मेरे विचार से ये शब्द बहुत आवश्यक हैं।
(संशोधन स्वीकार कर लिया गया। अनुच्छेद 274, संशोधित रूप में, संविधान का अंग बना लिया गया।)
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