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(3) लोकसभा, तथा प्रत्येक राज्य की विधानसभा के प्रत्येक आम चुनाव से पूर्व,
तथा विधानपरिषद् वाले प्रत्येक राज्य की विधानपरिषद् के लिए पहले आम
चुनाव तथा तत्पश्चात् प्रत्येक द्विवार्षिक निर्वाचन से पूर्व राष्ट्रपति निर्वाचन
आयोग से परामर्श करके खंड (1) द्वारा निर्वाचन आयोग को दिए गए कृत्यों
के पालन में आयोग की सहायता के लिए ऐसे प्रादेशिक आयुक्त भी नियुक्त
कर सकेगा जैसे वह आवश्यक समझें।
(4) संसद द्वारा निर्मित किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए निर्वाचन
आयुक्तों और प्रादेशिक आयुक्तों की सेवा की शर्तें और पदावधि ऐसी होंगी
जैसी कि राष्ट्रपति नियम द्वारा निर्धारित करेः
परन्तु मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से बिना वैसे कारणों और बिना वैसी रीति के नहीं हटाया जाएगा जैसे कारणों और रीति के उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश हटाया जा सकता है तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के पश्चात् उसकी सेवा की शर्तों में उसको अलाभकारी कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगाः
परन्तु यह और भी कि किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जाएगा।
(5) जब निर्वाचन-आयोग ऐसी प्रार्थना करे, तब राष्ट्रपति या किसी राज्य का
राज्यपाल या राजप्रमुख निर्वाचन आयोग या प्रादेशिक आयुक्त को ऐसे कर्मचारी
प्राप्त कराएगा जैसे कि खंड (1) द्वारा निर्वाचन आयोग को दिए गए कृत्यों
के निर्वहन के लिए आवश्यक हों।
माननीय सभापतिः मुझे कई संशोधनों की सूचना दी गई है। कुछ का उद्देश्य यह है कि अनुच्छेद 289, 290 और 291 के स्थान पर अन्य अनुच्छेद प्रविष्ट किए जाएँ और कुछ संशोधन उन संशोधनों पर है जो प्रस्तुत किए जाएंगे। मेरे विचार से मुझे इन संशोधनों को पहले लेना चाहिए जिनका उद्देश्य यह है कि इन अनुच्छेदों के स्थान पर अन्य अनुच्छेद रखे जाएँ। डॉ. अम्बेडकर एक संशोधन प्रस्तुत कर चुके हैं। एक अन्य संशोधन पंडित ठाकुरदास भार्गव के नाम से है।
पंडित हृदयनाथ कुंजरू (संयुक्त प्रान्तः जनरल)ः श्रीमान् क्या मैं यह पूछ सकता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर ने जो प्रस्ताव प्रस्तुत किया है उसके संबंध में क्या वे कुछ कहने नहीं जा रहे हैं? उसका संबंध एक महत्त्वपूर्ण विषय से है। क्या यह उचित नहीं है कि अनुच्छेद 289 के संबंध में डॉ. अम्बेडकर ने जो संशोधन प्रस्तुत किया है उसके संबंध में वे कुछ कहें? मेरे विचार से उचित यही होगा कि वे सभा को यह बताने का कष्ट करें कि वे अनुच्छेद 289 के स्थान पर एक नवीन अनुच्छेद को किस कारण प्रविष्ट करना चाहते हैं। यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण विषय है और ये खेद की बात है कि इस