200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रस्ताव के संबंध में डॉ. अम्बेडकर ने कुछ भी कहना उचित नहीं समझा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अध्यक्ष महोदय, इस प्रस्ताव के समर्थन में मैंने दो कारणों से कुछ कहना उचित नहीं समझा। एक कारण यह है कि यदि इस अनुच्छेद के संबंध में वाद-विवाद हुआ, जो अवश्य ही होगा, तो उस समय कुछ प्रश्न उठाए जाएँगे और मैंने यही उचित समझा कि मैं उनका अन्त में उत्तर दूँ ताकि मेरे भाषण में उन्हीं तर्कों की पुनरुक्ति न हो। एक कारण यह है।
दूसरा कारण यह है कि मैंने यह विचार किया कि प्रत्येक सदस्य ने मेरा संशोधन पढ़ लिया होगा और चूँकि वह बहुत सरल है, इसलिए उसका आशय हर एक समझ गया होगा। यह स्पष्ट है कि मेरे माननीय मित्र पंडित कुंजरू जल्दी में इस अनुच्छेद के मेरे नए मसौदे को नहीं पढ़ पाए हैं।
पंडित हृदयनाथ कुंजरूः मैंने उसकी प्रत्येक पंक्ति पढ़ी है। मैं केवल यह चाहता हूँ कि माननीय सदस्य महोदय सभा के प्रति कुछ आदर भाव दिखाएँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभा को स्मरण होगा कि बहुत पहले संविधान सभा ने अपनी कार्यवाहियों में मूलाधिकारों पर विचार करने के लिए एक समिति नियुक्त करने का आयोजन किया था। उस समिति ने अपने प्रतिवेदन में यह लिखा था कि यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि निर्वाचनों को स्वतंत्र रूप से कराना तथा विधान मंडल के निर्वाचनों में कार्य पालिका का हस्तक्षेप न होने देना एक मूलाधिकार है और इसे मूलाधिकार-विषयक अध्याय में समाविष्ट करना चाहिए। जब यह विषय सभा के सामने रखा गया तो सभा ने यह मत प्रकट किया कि यद्यपि इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती कि यह एक आधारभूत महत्त्व का विषय है किन्तु इसे संविधान के किसी अन्य भाग में स्थान देना चाहिए न कि मूलाधिकार विषयक अध्याय में। सभा ने बिना किसी प्रकार की असहमति प्रकट किए हुए इसकी पुष्टि की कि विधान मंडलों के लिए स्वतंत्र तथा शुद्ध रूप से निर्वाचनों को करने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि उनमें तत्कालीन कार्यपालिका का किसी प्रकार का हस्तक्षेप न हो। सभा के इस निर्णय को देखते हुए मसौदा-समिति ने इस विषय को मूलाधिकारों के अध्याय से निकाल दिया और उसे एक पृथक भाग में, जिसमें अनुच्छेद 289, 290 आदि हैं, स्थान दिया। इसलिए जहँं तक इस आधारभूत प्रश्न का संबंध है कि निर्वाचन-संगठन पर कार्यपालिका सरकार का कोई नियंत्रण न होना चाहिए, किसी प्रकार का मतभेद नहीं था। अनुच्छेद 289 में संविधान-सभा के उसी निर्णय का समावेश है। उसके द्वारा संसद के राज्यों के विधान मंडलों के निर्वाचनों की अधीक्षण, निदेशन तथा नियंत्रण तथा उनके लिए नामावली तैयार करने का अधिकार कार्यपालिका के अतिरिक्त एक निकाय को सौंपा गया है जो निर्वाचन आयोग कहा जाएगा। उप-खण्ड (1) में यही उपबन्ध है।