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उप-खण्ड (2) में कहा गया है कि एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा उतने अन्य निर्वाचन आयुक्त होंगे जितने राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करें। मसौदा-समिति के सामने दो विकल्प थे, अर्थात् या तो एक स्थायी निकाय को स्थापित करना जिसमें निर्वाचन काल में एक तदर्थ निकाय को स्थापित करने की शक्ति राष्ट्रपति को देना। समिति ने मध्यम मार्ग का अवलम्बन किया। उप-खण्ड (2) द्वारा मसौदा-समिति ने यही प्रस्ताव किया है कि एक व्यक्ति को अर्थात् मुख्य निर्वाचन आयुक्त को, स्थायी रूप से पदासीन रखा जाए ताकि निर्वाचन संगठन सूक्षम रूप में हमेशा उपलब्ध रहे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि साधारणतः प्रत्येक पाँच वर्ष के पश्चात् निर्वाचन होंगे किन्तु यह प्रश्न भी है कि उप-निर्वाचन किसी समय हो सकते हैं। पाँच वर्ष समाप्त होने के पूर्व ही विधानसभा विघटित हो सकती है। इसलिए इन आकस्मिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह पर्याप्त होगा कि एक पदाधिकारी, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त के नाम से कहा जाएगा, स्थायी रूप से पदासीन रहे और जब निर्वाचन हों तब राष्ट्रपति अन्य लोगों को नियुक्त करके निर्वाचन आयोग में सम्मिलित कर सकता है।
श्रीमान्, इसके अतिरिक्त आरंभ में अनुच्छेद 289 के अधीन यह आयोजन था कि केन्द्रीय विधानमंडल के दोनों - उच्च और निचले सदन के निर्वाचनों के लिए एक आयोग हो और प्रत्येक प्रान्त तथा राज्य के लिए एक पृथक निर्वाचन आयोग हो जिसे राज्यपाल अथवा राज्य का राजप्रमुख नियुक्त करे। उसमें तथा अनुच्छेद 289 के वर्तमान रूप में निस्सन्देह आधारभूत अन्तर है। इस अनुच्छेद के अधीन यह प्रस्ताव रखा गया है कि निर्वाचन संगठन एक ही आयोग के हाथ में रखा जाए और उसकी सहायता प्रादेशिक आयुक्त करें जो प्रान्तीय सरकार के अधीन रहकर कार्य न करें बल्कि केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के अधीक्षण तथा नियंत्रण में कार्य करें। जैसा कि मैं कह चुका हूँ यह एक आधारभूत परिवर्तन है। किन्तु यह परिवर्तन आवश्यक हो गया है क्योंकि हम यह देखते हैं कि इस समय भारत के कुछ प्रान्तों में मिश्रित जन-समुदाय है। उनमें एक तो वे लोग बसते हैं जो आरंभ से वहाँ के निवासी हैं। उनके साथ ऐसे लोग भी रहते हैं जिनका मूल वंश तथा जिनकी भाषा तथा संस्कृति उन बहुसंख्यक लोगों से भिन्न है जो वहाँ के निवासी हैं। मसौदा-समिति तथा केन्द्रीय सरकार के ध्यान में यह बात लाई गई है कि ऐसे प्रान्तों में कार्यपालिका सरकार इस प्रकार से प्रबंध कर रही है अथवा इस प्रकार से प्रबंध करने का आदेश दे रही है कि ये लोग जिनका मूल वंश तथा जिनकी भाषा और संस्कृति वहाँ के निवासियों से भिन्न है, निर्वाचन नामावलियों में स्थान नहीं दिए जा रहे हैं। मैं आशा करता हूँ कि सभा यह समझती है कि मताधिकार ही जनतंत्र का आधार स्तम्भ है। हमारे संविधान के अधीन वर्णित अवस्थाओं में 21 वर्ष की आयु के किसी वयस्क को यदि मतदाता के रूप में निर्वाचन नामावली में स्थान दिया जा सकता है तो उसे किसी स्थानीय सरकार के विद्वेष के कारण अथवा किसी पदाधिकारी