202 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की सनक के कारण इस अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। यदि यह हुआ तो इससे जनतंत्रात्मक सरकार के मूल पर ही आघात होगा। इसलिए ताकि किसी प्रान्त के ऐसे लोगों के प्रति जिनका मूल तथा वंश जिनकी भाषा और संस्कृति वहाँ के निवासियों से भिन्न हो प्रान्तीय सरकारें अन्याय न कर सकें यह उचित समझा गया कि उस मूल प्रस्ताव को स्वीकार न किया जाए जिसके अधीन प्रत्येक प्रान्त के लिए पृथक निर्वाचन आयोग स्थापित किया जाता और जिसका पथ-प्रदर्शन राज्यपाल और स्थानीय सरकार द्वारा होता। इसी कारण इस अनुच्छेद में परिवर्तन किया गया है और अब इसके अधीन यह आयोजन है कि निर्वाचन का पूरा संगठन केन्द्रीय निर्वाचन आयोग के हाथ में हो और वह आयोग निर्वाचक-पदाधिकारियों, मतग्राही पदाधिकारियों और निर्वाचक-नामावली के पर्यावलोकन में लगे हुए अन्य लोगों को निदेश दे ताकि भारत के किसी ऐसे नागरिक के प्रति अन्याय न हो सके, जिसे संविधान के अधीन निर्वाचक-नामावली में अपना नाम प्रविष्ट कराने का अधिकार हो। संविधान के मसौदे के वर्तमान उपबन्धों में यही एक आधारभूत परितर्वन किया गया है।
जहाँ तक खण्ड (4) का संबंध है, हमने यह राष्ट्रपति पर छोड़ दिया है कि वह निर्वाचन आयोग के सदस्यों की सेवा की शर्तें तथा पदावधि निश्चित करे किन्तु एक दो शर्तें भी रख दी हैं और इसका उल्लेख कर दिया है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त उन्हीं दशाओं में हटाया जा सकेगा जिन दशाओं में उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश हटाया जा सकता है। यदि इस सभा का उद्देश्य यह है कि निर्वाचन-संबंधी मामलों पर तत्कालीन कार्यपालिका सरकार का नियंत्रण न रहे तो यह अत्यंत आवश्यक है कि हम जिस नवीन संगठन को, अर्थात् निर्वाचन आयोग को, स्थापित करने जा रहे हैं उसे कार्यपालिका स्वेच्छा से विघटित न कर सके। इसलिए जहाँ तक पदच्युत होने का प्रश्न है, हमने इसके संबंध में मुख्य निर्वाचन आयुक्त की वही प्रतिष्ठा निश्चित की है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की है। किन्तु हम इस आयोग के अन्य सदस्यों को यह प्रतिष्ठा प्रदान करने नहीं जा रहे हैं। हमने यह राष्ट्रपति पर छोड़ दिया है कि वह जिन दशाओं में भी उचित समझे, निर्वाचन-आयोग के अन्य सदस्यों को पदच्युत करे, हमने केवल एक शर्त रखी है और वह यह है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को इस आशय की सिफारिश देनी होगी कि अमुक व्यक्ति को पदच्युत करना उचित तथा न्यायपूर्ण है।
इसके अतिरिक्त हमें यह प्रश्न भी हल करना था कि जो कार्य निर्वाचन आयोग को सौंपा गया है उसे पूरा करने के लिए उसे स्वतंत्र रूप से अपने कर्मचारी रखने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए अथवा नहीं। यह अनुभव किया गया कि यदि निर्वाचन आयोग को, निर्वाचक नामावली तैयार करने, निर्वाचक नामावलियों का पर्यावलोकन करने और निर्वाचनों के संचालन आदि का कार्य करने के लिए स्वतंत्र रूप से कर्मचारी वर्ग रखने का प्राधिकार दिया गया तो दो स्थानों पर कर्मचारी-वर्ग एक ही कार्य करेंगे