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जिससे प्रशासन-व्यय व्यर्थ में बढ़ जाएगा। यह धन बड़ी आसानी से बचाया जा सकता है क्योंकि, जैसा कि मैं कह चुका हूँ, निर्वाचन आयोग के पास कभी तो बहुत काम होगा और कभी कुछ भी काम नहीं होगा। इसलिए खण्ड (5) में हमने यह उपबन्धित किया है कि निर्वाचन आयोग को इसकी स्वतंत्रता होगी कि वह प्रान्तीय सरकारों से, दफतर के काम के लिए ऐसे कर्मचारियों को ले जिनकी उसे अपने काम को पूरा करने के लिए आवश्यकता हो। जब काम पूरा हो जाएगा तो ये कर्मचारी प्रान्तीय सरकार को वापस कर दिए जाएंगे। किन्तु जब तक ये लोग निर्वाचन आयोग के अधीन कार्य करेंगे तब तक उसी के प्रशासन के अधीन रहेंगे और कार्यपालिका सरकार के प्रशासन के अधीन नहीं रहेंगे। इस अनुच्छेद में यही उपबन्ध है। मुझे आशा है कि सभा की समझ में अब यह आ गया होगा कि उनका अर्थ क्या है और उनमें तथा संविधान के मसौदे के मूल अनुच्छेद में कितना अन्तर है।
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माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बईः जनरल)ः अध्यक्ष महोदय, मेरे इस संशोधन पर कई दृष्टिकोणों से आलोचना की गई है। किन्तु अपने उत्तर में मेरा यह विचार नहीं है कि बहस में जितनी बातें उठाई गई हैं उन सबका उत्तर दूँ। मेरा विचार केवल उन्हीं बातों का उत्तर देने का है जो मेरे मित्र प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना ने उठाई हैं और जिस पर मेरे मित्र पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने बल दिया है। मेरे मित्र प्रोफेसर सक्सेना ने जो संशोधन पेश किया है उसमें असल में दो बातें हैं जिन पर हमें विचार करना है। एक बात तो इस निर्वाचन आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति के विषय में है और दूसरी बात निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के विषय में है। जहाँ तक हटाने के प्रश्न का संबंध है, मेरा वैयक्तिक रूप से यह खयाल है कि मेरे प्रस्ताव में किसी परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सदन देखेगा कि जहाँ तक निर्वाचन आयोग के सदस्यों को हटाने का संबंध है, मुख्य आयुक्त की वही स्थिति है जो कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की है। और मैं नहीं जानता कि हमने खंड (4) के परन्तुक में जितनी सुरक्षा की व्यवस्था की है उससे अच्छी व्यवस्था किसी भी अन्य संविधान में विद्यमान हो।
अन्य आयुक्तों के विषय में यह उपबंध है कि उन्हें हटाने की शक्ति तो राष्ट्रपति के पास रहने दी गई है, पर उस शक्ति पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सीमा है कि अन्य आयुक्तों को हटाने के मामले में राष्ट्रपति मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही कार्यवाही कर सकता है। अतः मेरा कहना यह है कि जहाँ तक हटाने के प्रश्न का संबंध है, मेरे संशोधन में जो उपबन्ध रखे गए हैं वह पर्याप्त हैं और उस प्रयोजन के लिए अधिक कुछ भी आवश्यक नहीं है।
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 16 जून, 1949, पृ. 928-30