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लिए न तो अपात्र होगा और न ही उससे निकाले जाने का दावा करेगा।य्
श्रीमान् इस अनुच्छेद का उद्देश्य सदन के उस विनिश्चय को कार्यान्वित करना है कि आगे चलकर पृथव्Q निर्वाचक-गण नहीं होंगे। वास्तव में यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम संविधान के मसौदे के उन उपबंधों को हटा देंगे जिनमें मुस्लिमों, सिक्खों, आंग्ल भारतीयों आदि के प्रतिनिधित्व का उपबंध बनाया गया है। परिणामतः यह आवश्यक है। पर लोगों की यह भावना है कि हमने ऐसा महत्त्वपूर्ण विनिश्चय किया है जो विगत को लगभग समाप्त कर देता है, अतः यह अच्छा है कि संविधान में इसकी स्पष्ट चर्चा हो। इसी कारण मैंने यह संशोधन रखा है।
माननीय सभापतिः क्या मैं इसका यह अर्थ समझूं कि केवल वाद-विवाद के प्रयोजन के लिए ही अपने यह पेश किया है और इसे आप पारित करवाना नहीं चाहते?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, श्रीमान्, यह बात नहीं है। मैंने संशोधन पेश क्या है। मैं केवल कारण बता रहा था कि मैंने इसे पेश क्यों किया है।
मैं दूसरा संशोधन भी पेश करूँगा कि नया अनुच्छेद 289-ख प्रविष्ट कर दिया जाए। मैं प्रस्ताव करता हूँः
फ्कि संशोधन सूची के संशोधन संख्या 3087 के स्थान पर निम्न संशोधन रख दिया जाएः
‘कि अनुच्छेद 289-क के पश्चात् निम्न अनुच्छेद रख दिया जाएः ‘289-ख, लोकसभा प्रत्येक राज्य की विधान-सभा के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे, अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति जो भारत का नागरिक है, तथा जो ऐसी तारीख पर, जैसी कि समुचित विधानमंडल द्वारा निर्मित किसी विधि के द्वारा या अधीन इसलिए नियत की गई हो, इक्कीस वर्ष की अवस्था से कम नहीं है, तथा इस संविधान अथवा समुचित विधानमंडल द्वारा निर्मित किसी विधि के अधीन अनिवास, चित्त विकृति, अपराध अथवा भ्रष्ट या अवैध आचार के आधार पर अनर्ह नहीं कर दिया गया है, ऐसे किसी निर्वाचन में मतदाता के रूप में पंजीबद्ध होने का हकदार होगा।’
(संशोधन स्वीकृत हुआ। अनुच्छेद 289-ख संविधान में जोड़ा गया।)
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* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 15 जून, 1949, पृ. 930
+ पूर्वोक्त, पृष्ठ 930-31