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(संशोधन संख्या 1453 और 1454 प्रस्तावित नहीं किए गए।)
संशोधन संख्या 1455 श्री नजरुद्दीन अहमद के नाम से है। मैं समझता हूँ कि यह एक शाब्दिक संशोधन है। क्या आप इसे प्रस्तावित करना चाहेंगे? इन शाब्दिक संशोधनों के बारे में मैं माननीय डॉ. अम्बेडकर को यह सुझाव देने जा रहा हूँ कि इस प्रकार के शाब्दिक संशोधनों के बारे में जिन सदस्यों ने सूचना दी है, उनके साथ परामर्श करके इस बात पर सहमति बनाई जा सकती है कि जिन संशोधनों को स्वीकार किया जाएगा, उन्हें सभा में उस मामले को प्रस्तावित किए जाने के समय समावेश कर लिया जाएगा और इससे हम सभा का समय बचा सकेंगे और जो संशोधन स्वीकार्य नहीं हैं, निश्चय ही उनके बारे में हमें सोचना पड़ेगा कि क्या किया जाए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः प्रारूप समिति को बड़ी खुशी होगी, यदि यह प्रक्रिया अपनाई जाए।
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ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ किः
फ्अनुच्छेद 68 के खण्ड (2) के मामले में ‘राष्ट्रपति के द्वारा’ शब्दों के स्थान पर ‘संसद द्वारा कानून के अन्तर्गत’ प्रतिस्थापित किया जाए।
मैंने जो संशोधन प्रस्तावित किया है, उसके बारे में स्पष्टीकरण दिए जाने की कोई जरूरत नहीं है। यह देखा जा सकता है कि इस खण्ड के अन्तर्गत संसद का कार्यकाल बढ़ाने की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। ऐसा महसूस किया जा रहा है कि इससे एक साधारण संवैधानिक उपबंधों का अत्यधिक अतिक्रमण हो जाएगा और इस प्रकार के मामले में शक्ति वस्तुतः संसद में ही निहित रहनी चाहिए और इस प्रकार का उपबंध किए जाने की आवश्यकता है, जिसके माध्यम से संसद का कार्यकाल कानून बना कर बढ़ाया जा सकता है और किसी अन्य तरीके, जैसे किसी संकल्प या प्रस्ताव के द्वारा ऐसा नहीं किया जा सकता।
माननीय सभापतिः संशोधन संख्या 1465ः यह डॉ. अम्बेडकर के संशोधन में शामिल हो चुका है। इस पर विचार किया जाना आवश्यक नहीं है।
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** माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभापति महोदय, मैं नहीं समझता कि मेरे द्वारा प्रस्तुत संशोधन संख्या 1464 के संबंध में चर्चा के दौरान जो कुछ कहा गया है, उसके बारे में कोई जवाब देने की जरूरत है। मेरे विचार से इस संशोधन में बहुत ही
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 18 मई, 1949, पृ. 85
** वही पृष्ठ 88