6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उत्तम सिद्धांत समाविष्ट हैं और मुझे आशा है कि सभा इसे स्वीकार करेगी।
मेरे मित्र प्रोफेसर शाह द्वारा प्रस्तुत संशोधन के बारे में, मैं यह कहना चाहता हूँ कि इसके कारण कुछ कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं, जिनके बारे में मेरे मित्र श्री टी.टी. कृष्णमाचारी पहले ही बता चुके हैं। आखिरकार, चुनाव कोई साधारण सा मामला नहीं है। इसमें भारी धनराशि खर्च होती है और लघु अवधि के लिए बार-बार होने वाले चुनावों पर होने वाले भारी खर्च का बोझ सरकार और लोगों पर डालना अनुचित होगा। प्रोफेसर शाह द्वारा व्यक्त किए गए इस विचार के प्रति मेरी पूरी सहानुभूति है कि पूरे विश्व में ऐसा अनुभव रहा है कि किसी युद्ध के तुरंत बाद जब भी कोई चुनाव होता है तो कुछ समय के लिए लोग इतना असंतुलित रहते हैं कि उस समय के दौरान होने वाले चुनाव के परिणाम को लोगों के मन की सही अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता। लेकिन साथ ही मेरा यह मानना है कि हमें यह महसूस करना चाहिए कि युद्ध ही केवल एकमात्र कारण या परिस्थिति नहीं होती, जिसमें लोगों का मन डांवाडोल रहता है या हम कहें कि लोगों का मन सामान्य तौर पर स्थिर नहीं रहता। ऐसी बहुत सारी अन्य परिस्थितियाँ होती हैं, बहुत सारी घटनाएं हो सकती हैं, जो कि वस्तुतः युद्ध की श्रेणी में नहीं आते, लेकिन उनके कारण लोगों का मन किसी प्रकार से असंतुलित हो सकता है। इसलिए, एक प्रकार की स्थिति के लिए कोई उपबंध करने तथा अन्य प्रकार की स्थितियों को छोड़ देने का कोई लाभ नहीं होगा। इसलिए, मुझे प्रोफेसर शाह द्वारा प्रस्तुत किए गए संशोधन के बारे में ऐसा लगता है कि कुल मिलाकर बेहतर यही होगा कि यह प्रारूप संविधान पर छोड़ देना चाहिए कि ऐसी स्थिति के बारे में वह क्या प्रावधान करता है?
माननीय सभापतिः तो फिर मैं पूरे अनुच्छेद को डॉ. अम्बेडकर के संशोधन द्वारा संशोधित रूप में मतदान के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
प्रस्ताव है किः
फ्अनुच्छेद 68 को, यथासंशोधित रूप में संविधान का भाग बनाया जाए।य्
प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।
अनुच्छेद 68 को यथासंशोधित रूप में संविधान में जोड़ दिया गया।
अनुच्छेद 68-क
* माननीय सभापतिः अब मैं अनुच्छेद 68-क में प्रस्तुत किए गए नए अनुच्छेद को लेता हूँ। डॉ. अम्बेडकर।
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 18 मई, 1949, पृ. 89