8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं श्रीमती दुर्गा बाई का संशोधन स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। मैं किसी अन्य संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता।
माननीय सभापतिः क्या आप जवाब देना चाहते हैं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं नहीं समझता कि मेरे लिए इस पर कोई जवाब देना जरूरी है, लेकिन इतना जरूर कहना चाहूँगा कि यदि मैं श्रीमती दुर्गा बाई के संशोधन को स्वीकार करता हूँ तो कतिपय मामलों में यह अनुच्छेद 152 और 55 को असंगत बना देगा क्योंकि प्रान्तीय ऊपरी सदन के मामले में तथा उपराष्ट्रपति के मामले में भी हमने आयु-सीमा 35 वर्ष निर्धारित कर दी है। मुझे लगता है कि यदि यह विशिष्टता बरकरार भी रहती है, तो इससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। फिर भी, यह सभा पर निर्भर करता है, यदि वह चाहे तो एक समान आयु-सीमा निर्धारित कर सकती है।
माननीय सभापतिः मैं अब संशोधन पर मत लूँगा।
(श्रीमती दुर्गा बाई का निम्नलिखित संशोधन स्वीकृत हुआ।)
फ्कि नए अनुच्छेद 68-क, जिसे अनुच्छेद 68 के बाद अन्तःस्थापित किए जाने का प्रस्ताव है, की खण्ड (ख) में शब्द पैंतीस के स्थान पर शब्द ‘तीस’ प्रतिस्थापित किया जाए।य्
अनुच्छेद 68-क को यथासंशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया।
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अनुच्छेद 69
* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मुझे खेद है कि मैं इस अनुच्छेद के मामले में प्रस्तुत किए गए संशोधनों में से किसी को स्वीकार नहीं कर सकता। मैं नहीं समझता कि इनमें से किसी भी संशोधन सिवाए एक, जिस पर मैं अभी उत्तर दूंगा, पर कोई टिप्पणी करने की जरूरत है। प्रोफेसर शाह द्वारा रखे गए संशोधनों में कतिपय मुद्दे उठाए गए हैं। उनका पहला संशोधन (संख्या 1470) और दूसरा संशोधन (संख्या 1479) कमोबेश एक ही विषय का उल्लेख करते हैं और इस कारण मैं उन पर एक साथ विचार करने का प्रस्ताव करता हूँ ताकि उन्होंने इनके पक्ष में जो तर्क दिए हैं, उन पर बहस की जा सके। उन दोनों संशोधनों में प्रोफेसर शाह ने इस बात पर जोर दिया है कि संसद के दो सत्रों के बीच का अन्तराल तीन महीने से अधिक का नहीं होगा। इन दोनों संशोधनों का सार यही है।
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 18 मई, 1949, पृ. 104-107