अनुच्छेद 69 - Page 28

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मैं प्रोफेसर शाह के इन दो संशोधनों के साथ ही श्री कामत का संशोधन भी (संख्या 1471) लेना चाहता हूँ क्योंकि इसमें भी उसी प्रश्न को उठाया गया है। मुझे लगता है कि न तो प्रोफेसर शाह और न ही श्री कामत इस बात को समझ पाए हैं कि किन कारणों से भारत सरकार अधिनियम, 1935 में मूलतः इन खण्डों को स्थान दिया गया था। मैं समझता हूँ कि प्रोफेसर शाह और श्री कामत इस बात को महसूस करेंगे कि 1935 में पारित किए गए अधिनियम के समय का राजनीतिक वातावरण आज के वातावरण से पूरी तरह भिन्न था। 1935 में जो वातावरण मौजूद था, उसमें कार्यपालिका का उद्देश्य विधायिका को दबा कर रखना था। वस्तुतः उन दिनों विधानमण्डल का सत्र बुलाने का मुख्य उद्देश्य राजस्व संग्रह करने का होता था। उसके द्वारा केवल बजट को पारित करना होता था और उसके बाद कार्यपालिका को अपने वित्तीय प्रस्तावों, कराधान तथा राजस्व के विनियोग, दोनों ही मामलों में, विधायिका से मंजूरी लेने में सफलता मिल जाती थी और कार्यपालिका की इस विषय में कोई रुचि नहीं होती थी कि विधानमण्डल का सत्र इसलिए बुलाया जाए कि उसमें उनके दैनंदिन प्रशासन के बारे में कोई प्रश्न पूछा जाए अथवा सामाजिक शिकायतों को दूर करने हेतु कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाए या वे लोग अपने उन मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें। वस्तुतः, मैं स्वयं ही भारत के कुछ प्रांतीय विधानमंडलों, जो अधिनियम, 1935 के अधीन कार्यरत हैं, की प्रक्रिया पर बड़े ध्यान से गौर करता रहा हूँ और मैं प्रान्त विशेष के बारे में जानता हूँ, (मैं उसका नाम लेना नहीं चाहता) जहाँ विधानमंडल की बैठकपूरे साल भर में 18 दिनों से अधिक नहीं होती और विधानमण्डल की बैठक बुलाने का एकमात्र उद्देश्य राजस्व उगाही करने के प्रस्तावों के लिए मंजूरी प्राप्त करना होता है।

श्री तजामुल हुसैनः उसके लिए जिम्मेदार कौन था?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकरः मैं यह बताने जा रहा था कि विगत की कार्यपालिका की मनोवृत्ति इस आचरण के लिए जिम्मेदार थी क्योंकि उसकी विधान मण्डल की बैठक बुलाने तथा स्वयं और अपने प्रशासन की समीक्षा किए जाने में रुचि नहीं होती थी।

पंडित हृदयनाथ कुंजरूः वह कौन-सा प्रान्त था?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः बेहतर होगा कि उसे रहने दें। मैं निजी तौर पर अपने माननीय मित्र को उस प्रान्त का नाम बता सकता हूँ ऐसा महसूस किया गया कि यदि यही स्थिति व्याप्त रहने दी जाती है, जैसा 1935 से पूर्व हुआ करती थी तो यह लोकप्रिय सरकार की अवधारणा का मजाक ही होगा। विधायिका की बैठक महज राजस्व जुटाने के उद्देश्य से बुलाया जाना और फिर उसकी बैठक को समाप्त कर देना और उसे प्रश्नों या कानून के माध्यम से प्रशासन में सुधार लाने हेतु, कानून द्वारा प्रदत्त सभी वैध