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10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अवसरों से वंचित कर दिया जाना लोकतंत्र का मजाक ही होगा। इस प्रकार की घटना को रोकने के उद्देश्य से भारत सरकार अधिनियम, 1935 में यह खण्ड अन्तःस्थापित किया गया था। हम सब इस बात को जानते हैं और निजी तौर पर भी मेरा यह मानना है कि वह वातावरण अब पूरी तरह से बदल चुका है और मैं नहीं समझता कि अब कोई भी कार्यपालिका विधानमण्डल के मामले में इस तरह का निष्ठुर रवैया अपना सकने में सक्षम हो पाएगा। इसलिए हमने सोचा कि अपने वर्तमान संविधान में भी उसी

खण्ड को अतिरिक्त सावधानी के उपाय के रूप में जारी रहने दिया जाए। मेरे मित्र श्री कामत और प्रोफेसर शाह यह मानते हैं कि इतना ही पर्याप्त नहीं है। वे लोग चाहते हैं कि बार-बार सत्र बुलाए जाते रहने चाहिए। वर्तमान खण्ड विधानमंण्डल की बैठक को बार-बार बुलाए जाने से नहीं रोकता। वस्तुतः, मुझे तो यह आशंका है और मैं तो यह कहना चाहता हूँ कि संसद के सत्र इतने अधिक बार होंगे और वह इतना लम्बा चलेगा कि हो सकता है कि विधानमण्डल के सदस्य ही सत्रों से थक जाएं। इसका कारण यह है कि सरकार लोगों के प्रति जवाबदेह है। उसकी जिम्मेदारी महज अच्छे प्रशासन चलाने तक ही सीमित नहीं हो जातीः वह ऐसे कानूनी उपायों को प्रभावी बनाने के लिए भी लोगों के प्रति जिम्मेदार होगी, जो उनकी पार्टी के कार्यक्रमों को लागू करने के लिए आवश्यक होगा।

उसी प्रकार से बहुत सारे गैर-सरकारी सदस्य भी होंगे, जो अपनी सोच या अपनी छोटी-छोटी कल्पनाओं को प्रभावी बनाने हेतु गैर-सरकारी विधेयक उपस्थित करने के इच्छुक होंगे। आगे, दूसरे कारण भी हो सकते हैं, जिससे कार्यपालिका को विधायिका की बैठक बार-बार बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। मैं समझता हूँ कि कराधान उपायों को समय पर पूरा किए जाने, अनुदान और अनुपूरक अनुदानों की मांगों को पारित कराए जाने आदि प्रश्न ऐसे सशक्त कारक हैं, जो कि इस मुद्दे पर फैसला लिए जाने के मामले में बृहत्तर भूमिका निभाने जा रहा है कि विधायिका के सत्र कितनी बार बुलाए जाने चाहिएं?

इसलिए, सभा से मेरा अनुरोध है कि हमने जो छोटा सा प्रावधान किया है, वह अपने आप में पर्याप्त होगा। जहां तक अधिकतम प्रावधान किए जाने का संबंध है, यह मामला पूरी तरह से खुला हुआ है और जो कारण मैंने अभी बताए हैं कि इस खण्ड विशेष के द्वारा जो कार्यपालिका पर न्यूनतम बाधिता डाली गई है, महज उतने से ही उनका काम चल जाएगा, इस बारे में कोई आशंका नहीं है।

मैं प्रोफेसर शाह के संशोधन (सं. 1477) पर आता हूँ। इस विशेष संशोधन के माध्यम से प्रो. शाह खण्ड 67 (2) (क) से फ्किसी भी सभाय् शब्दों का विलोपन चाहते हैं। मैं उनके तर्कों को नहीं समझ सका हूँ। उन्होंने जो धारणा व्यक्त की है,