11
यदि मैं गलत हूँ तो मुझे सही कर देंगे - कि चूंकि उच्च सदन भंग नहीं होता, इसलिए राष्ट्रपति के लिए इसके कार्य संचालन हेतु उसकी बैठक बुलाना आवश्यक नहीं होगा। मुझे लगता है कि दोनों ही स्थितियों के बीच पूरी तरह भिन्नता है। प्रत्येक पांच वर्ष के अंत में जिस प्रकार से निम्न सदन को भंग किए जाने की जरूरत पड़ती है, उसी प्रकार से किसी कथित अवधि के दौरान किसी सभा को भंग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी_ लेकिन, कार्य सम्पादित करने हेतु उस सभा की बैठक बुलाया जाना एक अलग मामला है, जिसका अधिकार अभी भी बना रहेगा। सभा की बैठक यहाँ दिल्ली में प्रति वर्ष बारहों महीने प्रति दिन 24 घण्टे तक नहीं होने जा रही है। इसकी बैठक बुलाई जाएगी और जब भी सभा की बैठकें आहूत की जाएंगी, सदस्यगण उपस्थित होंगे। इसलिए, मुझे लगता है कि उच्च सदन की बैठक आहूत किए जाने की शक्ति का भी उपबंध किया जाना चाहिए, जैसा कि निचले सदन के मामले में किया गया है।
फिर मैं प्रो. शाह के दो अन्य संशोधनों (सं. 1473 और 1478) को लेता हूँ। संशोधन में प्रयुक्त किए गए शब्द थोड़े जटिल हैं। इन संशोधनों का सार यह है। प्रो. शाह को ऐसा लगता है कि राष्ट्रपति साधारण दिनों में अनुच्छेद के अनुरूप संसद को आहूत करने में विफल हो सकते हैं या वह संकटकालीन स्थिति में भी विधानमण्डल को आहूत नहीं कर सकते। इसलिए, उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में जहां राष्ट्रपति स्वयं में निहित शक्ति के अनुरूप कर्त्तव्य का निर्वहन करने में विफल रहता है, विधानमण्डल को आहूत करने की शक्ति निचले सदन के अध्यक्ष में अथवा उच्च सदन के सभापति या उपसभापति में निहित होनी चाहिए। प्रो. के.पी. शाह की व्याख्या यही है, यदि मैंने सही समझा है। मुझे ऐसा लगता है कि यहाँ फिर प्रो. शाह पूरी समिति को समझ नहीं पाए हैं। सबसे पहले तो मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि राष्ट्रपति अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करने में विफल क्यों रहेंगे, जिसका दायित्व विधि के द्वारा उन पर सौंपा गया है। यदि प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से संसद को आहूत करने का अनुरोध करते हैं और फिर राष्ट्रपति बिना किसी कारण के या फिर पूरी तरह से लापरवाही या अपनी हठधर्मिता के कारण संसद को आहूत करने से मना कर देता है, तो ऐसी स्थिति में ऐसे राष्ट्रपति को विस्थापित करने का हमारे संविधान में पहले से ही बहुत अच्छा उपाय किया गया है। हमारे पास उस पर अभियोग चलाने का अधिकार है क्योंकि राष्ट्रपति द्वारा उन दायित्वों, जो उन पर सौंपा गया है, को निभाने से मना करना निःसंदेह संविधान का उल्लंघन माना जाएगा। इसलिए, उस खण्ड विशेष में इसके लिए पर्याप्त उपाय अन्तर्विष्ट हैं।
लेकिन, यदि हम प्रो. के.पी. शाह के सुझाव को स्वीकार कर लेते हैं तो एक दूसरी प्रकार की कठिनाई उत्पन्न हो सकती है। उदाहरण के लिए राष्ट्रपति उचित कारण से विधानमण्डल की बैठक को आहूत नहीं करता और अध्यक्ष तथा सभापति विधानमण्डल