12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की बैठक को आहूत कर देता है, ऐसी स्थिति में क्या होगा? यदि राष्ट्रपति संसद को आहूत नहीं करता, तो उसका अर्थ है कि कार्यपालक सरकार के पास सभा में प्रस्तुत करने के लिए कोई भी कार्य नहीं है क्योंकि वही एकमात्र कारण है, जिसके आधार पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर विधानमण्डल का सत्र नहीं बुला सकता। अब न तो अध्यक्ष और न ही सभापति सभा के लिए कार्य मुहैया करा सकता है। कार्य तो कार्यपालिका अर्थात् प्रधानमंत्री, जिसे राष्ट्रपति को विधानमण्डल आहूत करने के लिए सलाह देना होता है, के द्वारा मुहैया कराया जाना है। इसलिए, मेरे विचार से अध्यक्ष या सभापति द्वारा इस प्रकार से सभा का सत्र बुलाए जाने के मामले में सभा के समक्ष कार्य प्रस्तुत करने हेतु प्रावधान किए बगैर विधानमण्डल को आहूत करने की शक्ति अध्यक्ष या सभापति को दे देना एक निरर्थक कार्य होगा और इस प्रकार के संशोधन को स्वीकार करने से किसी उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकती।
प्रो. के. टी. शाह द्वारा रखे गए अंतिम संशोधन (सं. 1482) का उद्देश्य यह है कि राष्ट्रपति को सभा भंग किए जाने की अनुमति तब तक नहीं देनी चाहिए, जब तक प्रधानमंत्री द्वारा उसे भंग किए जाने का कारण लिखित में प्रस्तुत नहीं कर दिया जाए। ठीक है, मैं नहीं समझता कि इन दो स्थितियों में क्या अंतर है जब प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के पास जाता है और उससे कहता है कि उसके विचार से सभा को भंग कर दिया जाना चाहिए और दूसरी स्थिति में प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को एक पत्र लिख कर कहता है कि सभा को भंग कर दिया जाना चाहिए। प्रो. के.पी. शाह ने अपने भाषण में यह नहीं बताया है कि सभा को भंग करने की अनुमति दिए जाने से पूर्व प्रधानमंत्री से इस लिखित दस्तावेज को प्राप्त किए जाने का, जो उन्होंने प्रस्ताव किया है, उससे कौन सा उद्देश्य पूरा होने जा रहा है? इसलिए, मैं इस बारे में कोई भी टिप्पणी करने में असमर्थ हूँ। यदि प्रो. के.पी. शाह का उद्देश्य यह है कि प्रधानमंत्री मनमाने ढंग से सभा को भंग करने के लिए नहीं कह सके तो मैं समझता हूँ कि सभा को विघटित किए जाने के संबंध में परम्परा का यदि समुचित ढंग से पालन किया जाए तो इस उद्देश्य की प्राप्ति वैसे ही हो जाएगी। जहाँ तक इसके बारे में मुझे समझ है, राजा को संसद भंग करने का अधिकार है। सामान्य तौर पर वह प्रधानमंत्री की सलाह पर सभा को भंग करता है, लेकिन एक बार ऐसा हुआ था, और निश्चय ही वह उस समय हुआ था, जब मैकाले ने अंग्रेजी इतिहास लिखा था, जिसमें उन्होंने संसद को भंग करने के अधिकार के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था, उस समय स्थिति इस प्रकार थीः सभी राजनीतिज्ञों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि उस समय पालन की जाने वाली परम्परा के अनुसार राजा, प्रधानमंत्री जो संसद को भंग कराना चाहता था, की सलाह मानने के लिए अनिवार्य रूप से बाध्य था। राजा यदि चाहता तो वह विपक्ष के नेता से पूछ सकता था कि क्या वह सरकार का गठन करने के लिए तैयार है ताकि प्रधानमंत्री, जिसने सभा को भंग किए जाने की इच्छा व्यक्त की थी, को