अनुच्छेद 81 - Page 43

24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय सभापतिः क्या अध्यक्ष के लिए शपथ दिलाने का प्राधिकार राष्ट्रपति से प्राप्त किया जाना अनिवार्य होना चाहिए?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं यह बताना चाहता हूँ कि संवैधानिक तौर पर ऐसा किया जाना जरूरी है क्योंकि शपथ दिलाने का कार्य सभा के संविधान के अंतर्गत आता है जिस पर अध्यक्ष का कोई प्राधिकार नहीं होता ...

माननीय सभापतिः मैं उस अवस्था के बारे में नहीं सोच रहा हूँ। मैं तो अध्यक्ष के चुनाव हो जाने के बाद की स्थिति पर विचार कर रहा हूँ।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे विचार से इसमें कुछ भी गलत या अपमानजनक नहीं हैं क्योंकि इसका साधारण सा कारण यह है कि सभा का संविधान, उसकी संरचना, सभा का वैधानिक रूप आदि ऐसे मामले हैं जो अध्यक्ष के कार्यक्षेत्र के दायरे से बाहर है। अध्यक्ष संसद के कार्यों का प्रभारी है और जब संसद का गठन हो जाता है और संसद का गठन तब तक नहीं होता जब तक सदस्यों द्वारा शपथ नहीं ले ली जाती। इसलिए शपथ लिया जाना वास्तव में उपबंध के अनुरूप सभा के गठन का एक भाग है और जहां तक उस बात का संबंध है मेरे विचार से वह प्राधिकार अध्यक्ष का नहीं होता इसलिए उसे अध्यक्ष को दिए जाने की आवश्यकता नहीं है।

माननीय सभापतिः मान लें सभा की बाद की बैठक में यदि अध्यक्ष अनुपस्थित हो और कोई नया सदस्य उस दिन आता है जब उपाध्यक्ष या कोई अन्य व्यक्ति पीठासीन हो।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अध्यक्ष को दिया गया प्राधिकार केवल अध्यक्ष में ही निहित नहीं होता बल्कि उपाध्यक्ष में, सभापीठ के पैनल में और कुछ समय के लिए पीठासीन अन्य व्यक्ति में भी निहित होता है।

माननीय सभापतिः अध्यक्ष को प्राधिकार के प्रत्यायोजन पर निर्भर रहना पड़ेगा।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हमें संविधान द्वारा तय किए गए सभी कार्याधिकारियों के विश्वास पर निर्भर रहना पड़ता है।

¹उपर्युक्त दर्शाए गए डॉ. अम्बेडकर का संशोधन स्वीकृत हुआ। अनुच्छेद 81 को संविधान में जोड़ दिया गया।ह्

* * * * *

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 19 मई, 1949, पृ. 133