अनुच्छेद 85 - Page 45

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय डॅ. बी.आर. अम्बेडकरः वे लोग सरकार के अधीन नहीं होते। अतः वे लोग इसके अन्तर्गत नहीं आते।

माननीय सभापतिः तब ठीक है।

* * * * *

# माननीय सभापतिः क्या कोई अन्य भी बोलना चाहते हैं। क्या डॉ. अम्बेडकर को कुछ कहना है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं माननीय श्री जी.एस. गुप्ता के नाम से प्रस्तुत संशोधन संख्या 1587 को छोड़कर किन्हीं और संशोधनों को स्वीकार नहीं करता।

(डॉ. अम्बेडकर का संशोधन स्वीकृत हुआ।)

* माननीय सभापतिः फिर आगे श्री कामत का संशोधन संख्या 1585 है। लेकिन, डॉ. अम्बेडकर के संशोधन स्वीकृत हो जाने के बाद उसे प्रस्तुत करने का प्रश्न ही नहीं उठता।

फिर श्री गुप्ता का संशोधन संख्या 1587 है जिसमें फ्औरय् शब्द का विलोप किए जाने की बात कही गई है। या उसके स्थान पर फ्अथवाय् शब्द को प्रतिस्थापित किया जाना है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह एक ही बात है। ‘और’ शब्द को विलोप किया जाए या फिर उसके स्थान पर ‘अथवा’ शब्द को प्रतिस्थापित किया जाए।

माननीय सभापतिः प्रस्ताव हैः

फ्कि अनुच्छेद 83 के खण्ड (1) के उपखण्ड (घ) के अंत में आए फ्औरय् शब्द का विलोप किया जाए।य्

संशोधन स्वीकृत हुआ।

ख्अनुच्छेद 83, यथासंशोधित रूप में, संविधान में जोड़ दिया गया।,

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अनुच्छेद 85

** माननीय सभापतिः हम लोगों ने उस विषय पर काफी रोचक चर्चा की जो कि किसी संशोधन की विषय-वस्तु नहीं है। इस खण्ड विशेष जिस पर पंडित मैत्रा बोल चुके हैं, को बदलने या उसमें कोई संशोधन करने हेतु कोई प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया गया है। उस मुद्दे पर कोई भी संशोधन प्रस्तुत नहीं किया गया है।

# वही पृष्ठ 142

* ख्., वही, 155-157