अनुच्छेद 86 - Page 46

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अब मैं मत लूंगा। क्या डॉ. अम्बेडकर कुछ कहना चाहेंगे?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, जब तक श्री कामत मुझे जवाब देने के लिए न कहें। श्री अलादि और अन्य लोग पहले ही जवाब दे चुके हैं और मैं भी अधिकतर उन्हीं बातों को दोहराऊँगा, मेरा तरीका अलग हो सकता है।

माननीय सभापतिः फिर संशोधन संख्या 1627, श्री जसपतराय कपूर का संशोधन। मैं समझता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर इसे स्वीकार करने के इच्छुक हैं।

प्रस्ताव हैः

फ्कि अनुच्छेद 85 के खण्ड (4) में ‘संसद के किसी सदन’ शब्दों के बाद ‘अथवा कोई समिति’ शब्दों को अन्तःस्थापित किया जाए।य्

संशोधन स्वीकृत हुआ।

¹अनुच्छेद 85 को संविधान में जोड़ा गया।ह्

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अनुच्छेद 86

* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः (बॉम्बे जनरल)ः महोदय, मुझे खेद है कि मैं अपने मित्र श्री लारी के संशोधन को स्वीकार नहीं कर सकता। दूसरी तरफ बैठे श्री अनन्तश्यानम अयंगर और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के साथ हुई मेरी पूरी सहमति के दृष्टिगत प्रस्तावकर्ता द्वारा दिए गए तर्कों पर विस्तृत उत्तर दिए जाने की आवश्यकता नहीं है। मेरे विचार से वे लोग जो कुछ कह चुके हैं उसमें और अधिक बातें जोड़कर सभा का वक्त बर्बाद करना वांछनीय नहीं है। उन लोगों का उत्तर मुझे पूरा लगता है।

फिर भी मैं श्री संथानम के इस संशोधन को स्वीकार करता हूँ कि ‘भारतीय राज्य के विधानमण्डल’ शब्दों के स्थान पर ‘संविधान सभा’ शब्दों को प्रतिस्थापित किया जाए।

¹श्री संथानम के संशोधन को छोड़कर अन्य सभी संशोधन अस्वीकृत हुए। अनुच्छेद 86 के यथासंशोधित रूप को संविधान में जोड़ा गया।ह्

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* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 20 मई, 1949, पृ. 172

** वही, पृष्ठ 178