अनुच्छेद 88 - Page 48

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की मांग की है। मेरा यह मानना है कि वे शब्द बहुत आवश्यक हैं और उन्हें बनाए रखा जाना चाहिए। मैं ऐसा इसिलए कह रहा हूँ क्योंकि अनुच्छेद 87 के खण्ड (2) और अनुच्छेद 91 में अन्तर्विष्ट उपबंधों में ये शब्द मिलेंगे। अनुच्छेद 87 के खण्ड (2) के अनुसार, मुख्य उपबंध इस प्रकार किया गया है कि प्रत्येक सदन द्वारा अपने सदस्यों की पृथक बैठकों में विधेयक को स्वतंत्र रूप से पारित किया जाएगा। उसके बाद अनुच्छेद 91 के अधीन संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए उसके पास प्रस्तुत किया जाएगा। मेरे मित्र श्री कामत इस बात को महसूस करेंगे कि अनुच्छेद 88 में अन्तर्विष्ट उपबंध अनुच्छेद 87 के खण्ड (2) में अन्तर्विष्ट मुख्य उपबंधों से अलग हट कर है। इसलिए, यह बताया जाना आवश्यक है कि संयुक्त बैठक में पारित विधेयक इस तथ्य के बावजूद राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा कि अनुच्छेद 87 के खण्ड (2) में अन्तर्विष्ट मुख्य उपबंधों से यह अलग है। इसलिए, मेरा यह कहना है कि फ्इस संविधान के प्रयोजनार्थय् शब्द मेरे विचार से जरूरी हैं और ये फालतू नहीं हैं।

अनुच्छेद 88 में अन्तर्विष्ट उपबंधों के संबंध में बहुत सारे वक्ताओं ने जो समुक्ति की है, उसके बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि उन लोगों ने जो आशंका व्यक्त की है, वह कुछ हद तक जायज है लेकिन जैसा कि अन्य सदस्यों ने कहा है कि किसी भी अर्थ में यह कोई नया उपबंध नहीं है। यह अन्य देशों के संविधानों में भी अन्तर्विष्ट है और इसलिए उन लोगों से मेरा यह सुझाव है कि वह इस अनुच्छेद को उसी रूप मेंरहने दें, जिस रूप में यह है और देखें कि आगे क्या होता है। यदि उन लोगों की आशंका सच साबित होती है तो मुझे इसमें कोई संशय नहीं है कि कुछ माननीय सदस्य संविधान के संशोधन के लिए निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से इस अनुच्छेद में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव करने हेतु आगे आएंगे।

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* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, इस अनुच्छेद पर विचार किए जाने पर मुझे ऐसा लगता है कि इसके बारे में आगे और विचार किए जाने की जरूरत है। इसलिए, मेरा आपसे नअुरोध है कि इस अनुच्छेद पर आज मत न लें।

माननीय सभापतिः इस अनुच्छेद के संबंध में 4 संशोधन प्रस्तुत किए गए हैं और पहला संशोधन अनुच्छेद 90 के खण्ड (1) के संबंध में है, जिसकी संख्या 1669 है, उसमें ‘केवल’ शब्द का विलोप किए जाने की मांग की गई है। श्री नजरुद्दीन अहमद उस संशोधन के महत्त्व पर जोर देना चाहते हैं। प्रारूप समिति द्वारा उस पर विचार किया जा सकता है। पूरे अनुच्छेद पर विचार होने जा रहा है।

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* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 20 मई, 1949, पृ. 191