अनुच्छेद 102 - Page 54

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में अन्तर्विष्ट है। धारा 43 में अन्तर्विष्ट उपबंध गवर्नर जनरल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्रदान करता है, जो कि उसकी राय में उन कृत्यों का निर्वहन करने के लिए आवश्यक है, जिनका दायित्व संविधान द्वारा उसे सौंपा गया है और उसका निर्वहन उसे अपने विवेक से तथा वैयक्तिक निर्णय के आधार पर करना जरूरी हो। धारा 43 के अधीन अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति गवर्नर जनरल को दी गई है, विधानमंडल को इससे पूरी तरह से बाहर रखा गया था। गवर्नर जनरल, जो चाहे कर सकता था, जो कि उसके विशेष कृत्य का निर्वहन करने के लिए उसकी राय में जरूरी हो। दूसरी बात यह है कि धारा 43 के अधीन गवर्नर जनरल द्वारा उस समय भी अध्यादेश प्रख्यापित किए जा सकतें थे, जबकि विधानमण्डल का सत्र चल रहा हो। धारा 43 के प्रावधानों के अंतर्गत वह समांतर विधायी प्राधिकारी है। यह देखा जा सकता है कि वर्तमान अनुच्छेद 102 में वैसा कोई भ्ी उपबंध अन्तर्विष्ट नहीं है, जो भारत सरकार अधिनियम की धारा 43 में अन्तर्विष्ट थे। अतः राष्ट्रपति के पास कोई स्वतंत्र वैधानिक श्क्ति प्राप्त नहीं है, जैसा कि धारा 43 के अधीन गवर्नर जनरल को प्राप्त थी। इस अनुच्छेद के अधीन उसे उन दिनों अध्यादेश प्रख्यापित करने का हक प्राप्त नहीं है, जब विधानमण्डल का सत्र चल रहा हो। हम लोग सिर्फ इतना कर रहे हैं कि धारा 42 के अधीन गवर्नर जनरल को प्रदान की गई शक्तियाँ राष्ट्रपति को अनुच्छेद 102 के उपबंधों के अधीन प्रदान कर दी जाएं। वे उपबंध उस अवधि से संबंधित हैं, जब विधानमंण्डल अवसान की अवस्था में हो, उसका सत्र नहीं चल रहा हो। उसी स्थिति में अनुच्छेद 102 में अन्तर्विष्ट उपबंधों का प्रयोग किया जा सकता है। अनुच्छेद 102 में अन्तर्विष्ट उपबंध राष्ट्रपति को कोई ऐसी शक्ति प्रदान नहीं करते, जो केन्द्रीय विधानमण्डल के पास स्वयं ही नहीं है, क्योंकि उनकी कोई विशेष जिम्मेदारी नहीं होती, उनके पास कोई विवेकाधीन शक्ति नहीं है और न ही वैयक्तिक निर्णय करने का कोई अधिकार दिया गया है। तद्नुसार, मेरा यह कहना है कि मेरे मित्र पं. कुंजरू ने जो तर्क प्रस्तुत किए हैं, वे अनुच्छेद 102 के उपबंधों से काफी परे चला गया है। यदि मैं यह कहूँ कि यह अनुच्छेद कुछ हद तक ब्रिटिश इमरजैंसी पावर्स एक्ट, 1920 में अन्तर्विष्ट उपबंधों के समान है। मैं बड़ी सतर्कता के साथ इस भाषा का प्रयोग कर रहा हूँ। उस अधिनियम के अधीन भी राजा को अध्यादेश जारी करने का हक है और जब अध्यादेश जारी किया जाता है तो कार्यपालिका को किसी मामले को निपटाने के लिए कोई भी विनियम जारी करने का हक प्राप्त हो जाता है और यह अनुमति तब दी जाती है, जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो। सभा से मेरा निवेदन यह है कि ऐसे मामलों के बारे में कल्पना करना कठिन नहीं है, जहां साधारण कानून द्वारा प्रदान की गई कोई शक्तियाँ किसी ऐसी स्थिति में जो अचानक और तत्काल उत्पन्न हो गई हों, से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में कार्यपालिका क्या करे? कार्यपालिका के सामने एक नई स्थिति उत्पन्न हो चुकी हो, जिसे प्राक्कलन के