अनुच्छेद 102 - Page 55

36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आधार पर निपटाया जाना जरूरी हो और विद्यमान कानून संहिता के अधीन उसे निपटाने की शक्ति उसे प्राप्त नहीं हो। आपात स्थिति से निपटना जरूरी होता है और मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इस समस्या का एकमात्र समाधान राष्ट्रपति को ऐसे कानून प्रख्यापित करने की शक्ति प्रदान करना है, जिससे उस स्थिति से निपटने में कार्यपालिका समर्थ हो सके क्योंकि वह कानून की साधारण प्रक्रिया को अपनाने की स्थिति में नहीं होती और फिर यह मान लेना चाहिए कि उस समय विधानमण्डल का सत्र नहीं चल रहा होगा। इसलिए मुझे तो नहीं लगता कि अनुच्छेद 102 में अन्तर्विष्ट उपबंधों पर मूल रूप से आपत्ति किए जाने का कोई आधार है।

मेरे मित्र श्री पोकर ने अपने संशोधन संख्या 1796 में जो बात उठाई है, उसमें उन्होंने यह तर्क दिया है कि ऐसे किसी भी अध्यादेश के माध्यम से किसी नागरिक को उसकी वैयक्तिक स्वतंत्रता के मूलाधिकार से सक्षम विधि न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होने के अलावा और किसी ढंग से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। अब जहां तक उनके संशोधन का संबंध है, मैं समझता हूँ कि इन्होंने अनुच्छेद 102 का खण्ड (3) नहीं पढ़ा है। अनुच्छेद 102 के खण्ड (3) में यह निर्धारित किया गया है कि अनुच्छेद 102 के उपबंधों के अधीन राष्ट्रपति द्वारा बनाया गया कोई भी कानून उन्हीं सीमाओं के विषयाधीन होगा जो सामान्य प्रक्रिया के माध्यम से विधानमण्डल द्वारा बनाए गए किसी कानून के मामले में लागू होती हैं। अब विधानमण्डल द्वारा साधारण प्रक्रिया के माध्यम से कोई कानून बनाया जाता है तो वह इस प्रारूप संविधान के मूलाधिकारों से संबंधित अनुच्छेदों में अन्तर्विष्ट उपबंधों के विषयाधीन होगा। ऐसी स्थिति में अनुच्छेद 102 के उपबंधों के अधीन बनाया गया कोई भी कानून नागरिकों के मूलाधिकारों से संबंधित उपबंधों के विषयाधीन होगा और इसलिए ऐसा कोई भी कानून उन उपबंधों को अवक्रमित करने में समर्थ नहीं हो सकेगा और मेरे मित्र श्री पारित द्वारा अपने संशोधन संख्या 1796 में सुझाए गए किसी उपबंध की जरूरत नहीं है।

मेरे मित्र श्री कामत द्वारा सुझाया गया संशोधन अर्थात् 1793 मुझे बिल्कुल प्रयोजनरहित लगता है। मान लें किसी एक सभा का सत्र चल रहा हो और दूसरी सभा का सत्र नहीं चल रहा हो। यदि ऐसी स्थिति, जैसी कि मैंने सुझाई है, उत्पन्न होती है तो फिर अनुच्छेद 102 के उपबंध आवश्यक हैं क्योंकि इस संविधान के अनुसार कोई भी कानून किसी एक ही सभा के द्वारा पातिर नहीं किया जा सकता। कानून बनाने की प्रक्रिया में दोनों सभाओं को भाग लेना होगा। इसलिए, किसी एक ही सभा की उपस्थिति वस्तुतः सभी स्थितियों को पूरा नहीं कर पाती।

श्री एच.वी. कामतः क्या इसका अर्थ यह है कि जब एक सभा मान लीजिए लोक सभा सत्र में नहीं हो, तो भी राष्ट्रपति के पास यह शक्ति होगी?